SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 533
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ एकोनविंश पर्व देवो जगद्गुरुरसौ वृषभोऽनुमत्य' श्रीमानिमौ प्रहितवान् जगतां विधाता। तेनानयोः खचरभूपतयोऽनुरागादाज्ञां वहन्तु शिरसेत्यवदत् फणीन्द्रः ॥१८३॥ तत्पुण्यतो गुरुवियोगनिरूपणाच्च नागादिभतरुचितादनुशासनाच्च । ते तत्तथैव खचराः प्रतिपेदिरे द्राक् कार्य हि सिद्धयति महनिरधिष्टितं यत् ॥१८४॥ गान्धार पन्नगपदोपपदे च विद्ये दत्वा फणा वदधिपो विधिवत्स ताभ्याम् । धीरो विसर्य नयविद्विनती कुमारौ स्वावासमेय च जगाम कृतकार्यः ॥१८५॥ मालिनी अथ गतवति तस्मिन्नागराजेऽगराजे ति मधिकमधत्तो तौ युवानौ युवानो'। मुहुरुपहृत नानानूनभोगनभोगैमुकुलित करमौलिब्यनमाराध्यमानौ ॥१८६॥ "नियतिमिव खगामेखला तामलढयां ''सुकृतिजननिवासावाप्सनाकानुकाराम् । जिनसमवसूतिं वा विश्वलोकाभिनन्या नमिविनमिकुमारावध्य वातामुदाताम् ॥१८७॥ । मन्दाक्रान्ता विद्यासिन्दि "विधिनियमितां मानयन्तो नयन्तौ विद्यावृद्धैः सममभिमतामर्थ सिद्धि प्रसिद्धिम् । विद्याधीनान् षड्नुसुखदान्निविशन्तौ च भोगान् तो तत्रादौ "स्थितिमभजतां खेचरैः संविभक्ताम् ॥ उत्तर-श्रेणीका अधिपति रहे। कर्मभूमिरूपी जगत्को उत्पन्न करनेवाले जगद्गुरु श्रीमान् भगवान् वृषभदेवने अपनी सम्मतिसे इन दोनोंको यहाँ भेजा है इसलिए सब विद्याधर राजा प्रेमसे मस्तक झुकाकर इनकी आज्ञा धारण करें॥१८२-१८३॥ उन दोनोंके पुण्यसे तथा जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवकी आज्ञाके निरूपणसे और धरणेन्द्रके योग्य उपदेशसे उन विद्याधरोंने वह सब कार्य उसके कहे अनुसार ही स्वीकृत कर लिया था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषों के द्वारा हाथमें लिया हुआ कार्य शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है ॥१८४।। इस प्रकार नयोंको जाननेवाले धीर-वीर धरणेन्द्रने उन दोनोंको गान्धारपदा और पन्नगपदा नामको दो विद्याएँ दी और फिर अपना कार्य पूरा कर विनयसे झुके हुए दोनों राजकुमारोंको छोड़कर अपने निवासस्थानपर चला गया ।।१८५।। तदनन्तर धरणेन्द्रके चले जानेपर नाना प्रकारके सम्पूर्ण भोगोपभोगोंको बार-बार भेंट करते हुए विद्याधर लोग हाथ जोड़कर मस्तक नवाकर स्पष्ट रूपसे जिनकी सेवा करते हैं ऐसे वे दोनों कुमार उस पर्वतपर बहुत ही सन्तुष्ट हुए थे ॥१८६।। जो अपने-अपने भाग्यके समान अलंघनीय है, पुण्यात्मा जीवोंका निवास होनेके कारण जो स्वर्गका अनुकरण करती है तथा जो जिनेन्द्र भगवान के समवसरणके समान सब लोगोंके द्वारा वन्दनीय है ऐसी उस विजयाध पर्वतकी मेखलापर वे दोनों राजकुमार सुखसे रहने लगे थे ।।१८७॥ जिन्होंने स्वयं विधिपूर्वक अनेक विद्याएँ सिद्ध की हैं और विद्यामें चढ़े-बढ़े पुरुषोंके साथ मिलकर अपने अभिलषित अर्थको सिद्ध किया है ऐसे वे दोनों ही कुमार विद्याओंके अधीन प्राप्त होनेवाले तथा छहों ऋतुओंके सुख देनेवाले भोगोंका उपभोग करते हुए उस पर्वतपर विद्याधरोंके द्वारा विभक्त को हुई स्थितिको प्राप्त हुए थे। भावार्थ-यद्यपि वे जन्मसे विद्याधर नहीं थे तथापि वहाँ जाकर उन्होंने स्वयं अनेक विद्याएँ सिद्ध कर ली थीं १. अनुमति कृत्वा । २. प्रेरितवान् । ३. तेन कारणेन । ४. त्वत्पुण्यतः त्वत्कुमारयोः सुकृतात । ५. अनुमेदिरे । ६. आथितम् । ७. गान्धारविद्या पन्नगविद्या चेति द्वे विद्ये । ८. फणीश्वरः । .९. संतोषम् । १०.-मधात्तांप०, अ०, द०, ल०, म० । ११. सम्पर्क कुर्वाणी। 'यु मिश्रणे' । १२. प्राप्त । १३. कुङ्मलित, हस्तघटितमकुटं यथा भवति तथा । १४. विधिम् । १५. पुण्यवज्जन, पक्षे सुरजन । १६. इव । १७. अधिवसति स्म । १८. विधान । १९. प्रयोजनम् । २०. मर्यादाम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy