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________________ ४४० आदिपुराणम् यास्य सानुषु तिर्वियुधानां राजतेषु' वनितानुगतानाम् । सा न नाकवसती न हिमाद्रौ नापि मन्दरगिरेस्तटमागे ॥१६९॥ वसन्ततिलकम् गण्डोपलं वनकरीन्द्रकपोलका संक्रान्तदानसलिलप्लुतमत्र शैले । पश्यन्नयं द्विपविशक्तिमना मृगेन्द्रो भूयोऽमिहन्ति नखरैर्विलिखत्युपान्तम् ॥१७॥ सिंहोऽयमत्र गहने शनकैर्विबुद्धौ ग्याजम्मते शिखरमुत्पतितुं कृतेच्छः । . तन्वन् गिरेरधिगुहा मुखमट्टहासलक्ष्मी शरच्छशिवरामलदेहकान्तिः ॥१७॥ मन्दाक्रान्ता रम्भादरेरयमजगरः सामिकर्षन् स्वमङ्गं पुम्जीभूतो गुरुरिव गिरेरान्त्रमारो निकुझे। स्वश्वासं वदनकुहरं''ज्याददात्यापतद्मि वन्यः सत्त्वैः किल विलधिया क्षुष्प्रतीकारमिच्छुः ॥१७२॥ पृथ्वी - भयं जलनिधेर्जलं स्पृशति सानु मिर्वारिधि स्त टानि शिशिरीकरोति गिरिभर्तुरस्यान्वहम् । . महद्विधुतवीचिशीकरशतैरजनोस्थितः महानुपगत जनं शिशिरवस्य"नुष्णाशयः ॥१३॥ की सन्ततिको ही धारण कर रहा हो ।।१६८।। अपनी-अपनी देवांगनाओंके साथ विहार करते हुए देवोंको इस पर्वतके रजतमयी शिखरोंपर जो सन्तोष होता है वह उन्हें न तो स्वर्गमें मिलता है, न हिमवान् पर्वतपर मिलता है और न सुमेरु पर्वतके किसी तटपर ही मिलता है ॥१६॥ इधर देखो, जो जंगली हाथियोंके गण्डस्थलोंको रगड़से लगे हुए मद-जलसे सर-बतर हो रहा है, ऐसे इस पहाड़पर-की गोल चट्टारको यह सिंह हाथी समझ रहा है इसीलिए यह उसे देखकर बार-बार उसपर प्रहार करता है और नाखूनोंसे समीपकी भूमिको खोदता है।।१७०।। इधर इस वनमें शरऋऋतुके चन्द्रमाके समान निर्मल शरीरकी कान्तिको धारण करता हुआ तथा इस पर्वतके गुफारूपी मुखपर अट्टहासकी शोभा बढ़ाता हुआ यह सिंह धीरे-धीरे जागकर जमुहाई ले रहा है और पर्वतके शिखरपर छलांग मारनेकी इच्छा कर रहा है ॥१७१॥ इधर यह लतागृहमें अजगर पड़ा हुआ है, यह पर्वतके बिलमें-से अपना आधा शरीर बाहर निकाल रहा है और ऐसा जान पड़ता है मानो एक जगह इकट्ठा हुआ पहाड़की अंतड़ियोंका बड़ा भारी समूह हीहो। इसने श्वास रोककर अपना मुँहरूपी बिल खोल रखा है और उसे बिल समझ कर उसमें पड़ते हुए जंगली जीवोंके द्वारा यह अपनी क्षुधाका प्रतिकार करना चाहता है॥१७२।। यह पर्वत अपने लम्बे फैले हुए शिखरोंसे समुद्रके जलका स्पर्श करता है और यह समुद्र वायुसे कम्पित होकर निरन्तर उठती हुई लहरोंकी अनेक छोटी-छोटी बूंदोंसे प्रतिदिन इस गिरिराजके तटोंको शीतल करता रहता है सो ठीक ही है क्योंकि जिनका अन्तःकरण शीतल अर्थात् शान्त होता है ऐसे महापुरुष समीपमें आये हुए पुरुषको शीतल अर्थात् शान्त करते ही हैं ॥१७॥ wwwww - १. रजतमयेषु । २. स्वर्गालये । ३. स्थूलपाषाणम् । ४. कर्षणघर्षण । ५. आदित। ६. अमिताडयति। ७. शनैः । ८. गुहामुखे । ९. अर्द निर्गमयन् । १० पुरीतत्समूहः । ११. विवृणोति । १२. आगच्छद्भिः । १३. आश्रितम् । १४. शैत्ययुक्तहृदयः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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