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________________ अष्टादशं पर्व ४१५ चामीकरमय प्रस्थरछाया संश्रयिणीम॑गीः । हिरण्मयीरिवारूढतच्छाया दधतं क्वचित् ॥११॥ क्वचिद् विचित्ररत्नांशुरचितेन्द्रधनुर्लताम् । दधानमनिलोद्धतां ततां कल्पलतामिव ॥१८२॥ क्वचिच्च विचरहिन्यकामिनीनृपुरारकैः । रमणीयसरस्तीरं हंसीविरुतमूछितैः ॥१८३॥ क्वचिद् विचतुरक्रीडामाचरभिरनेकपैः । सलिलान्दोलितालानैरालोलितवनगुमम् ॥१८॥ क्वचित् पुलिनसंसुप्तसारसीरुतमूच्छितैः । कलहंसीकलक्वाणैर्वाचालितसरोजलम् ॥१८५॥ क्वचित् क्रुद्धाहि सूत्कारैः श्वसन्तमिव हेलया। क्वचिच्च चमरीयूथैहसन्तमिव निर्मलैः ॥१८॥ गुहानिलैः क्वचिद्वयक्तमुच्छवसन्तमिवायतम् । क्वचिच्च पवनाधूतैघूर्णन्तमिव पादपैः ।।१८७॥ निभृतं चिन्तयन्तीमिरिष्टकामुकसंगमम् । "विजने "खचरस्त्रीभिः मूकीभूतमिव क्वचित् ।।१८८॥ क्वचिच्च चटुलोदञ्च चम्चरीककलस्वनैः । "किमप्यारब्धसंगीतमिव व्यायतमूर्छनम् ।।१८९॥ कदम्बामोदसंधादिसुरमिश्वसितैर्मुखैः । तरुणार्ककरस्पर्शाद् विबुधैरिव पङ्कजैः ।।१९०।। रहे थे ॥१८०॥ कहीं उस पर्वतपर सुवर्णमय तटोंकी छायामें हरिणियाँ बैठी हुई थी उनपर उन सुवर्णमय तटोंकी कान्ति पड़ती थी जिससे वे हरिणियाँ सुवर्णकी बनी हुई-सी जान पड़ती थीं ॥१८१।। कहीं चित्र-विचित्र रत्नोंकी किरणोंसे इन्द्रधनुषकी लता बन रही थी और वह ऐसी मालूम होती थी मानो वायुसे उड़कर चारों ओर फैली हुई कल्पलता हो हो ॥१८२॥ कहीं देवांगनाएँ विहार कर रही थीं, उनके नूपुरोंके शब्द हंसिनियोंके शब्दोंसे मिलकर बुलन्द हो रहे थे और उनसे तालाबोंके किनारे बड़े हो रमणीय जान पड़ते थे॥१८।। कहीं लीला मात्रमें अपने खूटोंको उखाड़ देनेवाले बड़े-बड़े हाथी चतुराईके साथ एक विशेष प्रकारकी क्रीड़ा कर रहे थे और उससे उस पर्वतपर-के वनोंके वृक्ष खूब ही हिल रहे थे ॥१८४॥ कहीं किनारेपर सोती हुई सारसियोंके शब्दोंमें कलह सिनियों (बतख ) के मनोहर शब्द मिल रहे थे और . उनसे तालाबका जल शब्दायमान हो रहा था ॥१८५।। कहीं कुपित हुए सर्प शू-शू शब्द कर रहे थे जिनसे वह.पवत ऐसा जान पड़ता था मानो क्रीड़ा करता हुआ श्वास ही ले रहा हो. और कहीं निर्मल सुरागायोंके झुण्ड फिर रहे थे जिनसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ॥१८६।। कहीं गुफासे निकलती हुई वायुके द्वारा वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो प्रकट रूपसे लम्बी साँस ही ले रहा हो और कहीं पवनसे हिलते हुए वृक्षोंसे ऐसा मालूम होता था मानो वह झूम ही रहा हो ॥१८७॥ कहीं उस पर्वतपर एकान्त स्थानमें बैठी हुई विद्याधरोंकी स्त्रियाँ अपने इष्टकामी लोगोंके समागमका खूब विचार कर रही थीं जिससे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो चुप ही हो रहा हो॥१८८। और कहीं चंचलतापूर्वक उड़ते हुए भौरोंके मनोहर शब्द हो रहे थे और उनसे वह पर्वत ऐसा मालूम होता था मानो उसने जिसकी आवाज बहुत दूर तक फैल गयी है ऐसे किसी अलौकिक संगीतका ही प्रारम्भ किया हो ॥१८९॥ -- उस पर्वतपर-के वनों में अनेक तरुण विद्याधरियाँ अपने-अपने तरुण विद्याधरोंके साथ विहार कर रही थीं। उन विद्याधरियोंके मुख कदम्ब पुष्पकी सुगन्धिके समान सुगन्धित श्वाससे सहित थे और जिस प्रकार तरुण अर्थात् मध्याह्नके सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे कमल १. सानु । २. धृतचामीकरच्छायाः । ३. मिश्रितः । ४. विशेषेण चतुरः । ५. ध्वनिसम्मिश्रः । ६.-फूत्कारः प० । -शूत्कारः म०, ल०। ७. दीर्घ यथा भवति तथा । ८. भ्रमन्तम् । ९. संवृतावयवं यषा । भवति तथा । १०. एकान्तस्थाने । ११. खेचर-म०, ल० । १२. श्लाघ्य । १३. उद्गच्छत् । १४. ईषत् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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