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________________ अष्टादशं पर्व ४१३ शशिकान्तोपलैरिन्दु तारकाः कुमुदोरकरैः । 'उडूनि निर्भरच्छेदैः 'न्यक्कृत्येवोच्चकैः स्थितम् ॥१६॥ सितैर्घनैस्तटीः शुभ्रः यद्भिरनिलाहृतः । कृतोपचयमारूद्धवना मोगर्घनात्यये ॥१६॥ प्रोत्तुङ्गो मरुरेकान्तासमदरस धृतायतिः । इति तोषादिवोन्मुक्त प्रहासं निर्भरारवैः ॥१६॥ सुविशुद्धोऽहमामूलादाकं रजतोश्चयः । शुद्धाः कुलाइयो नैवमितीवाविष्कृतोन्नतिम् ॥१६९॥ खचरैः सह संबन्धाद् गंगासिन्धोरधः स्थितेः । जित्वेव कुलकुत्कीलान् बिभ्राणं विजयाद्यताम् ॥१७॥ अचलस्थितिमुत्तुङ्गं "शुद्धिमाज जगद्गुरुम । जिनेन्द्रमिव नाकीन्द्रः शश्वदाराध्यमादरात् ॥१७१॥ 'अक्षरत्वादभेद्यस्वादलरुष्यत्वान्महोन्नतेः । गुरुवाच्च जगदातुरा तन्वानमनुक्रियाम् ॥१७२॥ रहा हो ॥१६५।। वह पर्वत चन्द्रकान्तमणियोंसे चन्द्रमाको, कुमुदोंके समूहसे ताराओंको औरनिर्झरनोंके छींटोंसे तक्षत्रोंको नीचा दिखाकर ही मानो बहुत ऊँचा स्थित था ॥१६६॥ शरद् ऋतुमें जब कभी वायुसे टकराये हुए सफेद बादल वन-प्रदेशोंको व्याप्त कर उसके सफेद किनारोंपर आश्रय लेते थे तब उन बादलोंसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो कुछ बढ़ गया हो ॥१६७।। उस पर्वतपर जो निर्झरनोंके शब्द हो रहे थे उनसे वह ऐसा मालूम होता था मानो सुमेरु पर्वत केवल ऊँचा ही है हमारे समान लम्बा नहीं है इसी सन्तोषसे मानो जोरका शब्द करता हआ हँस रहा हो ॥१६८।। मैं बहत ही शद्ध हैं और जडसे लेकर शिखर तक चाँदीचाँदीका बना हुआ हूँ, अन्य कुलाचल मेरे समान शुद्ध नहीं हैं, यह समझकर ही मानो उसने अपनी ऊँचाई प्रकट की थी ॥१६९।। उस पर्वतका विद्याधरोंके साथ सदा संसर्ग रहता था और गंगा तथा सिन्धु नामकी दोनों नदियाँ उसके नीचे होकर बहती थीं। इन्हीं कारणोंसे उसने अन्य कुलाचलोंको जीत लिया था तथा इसी कारणसे वह विजया इस सार्थक नामको धारण कर रहा था। भावार्थ-अन्य कुलाचलोंपर विद्याधर नहीं रहते हैं और न उनके नीचे गंगा सिन्धु ही बहती हैं बल्कि हिमवत् नामक कुलाचलके ऊपर बहती हैं। इन्हीं विशेषताओंसे मानो उसने अन्य कुलाचलोंपर विजय प्राप्त कर ली थी और इस विजयके कारण ही उसका विजया (विजय+आ+ऋद्धः) ऐसा सार्थक नाम पड़ा था ।।१७०।। इन्द्र लोग निरन्तर उस पर्वतकी जिनेन्द्रदेवके समान आराधना करते थे क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव अचल स्थित हैं अर्थात् निश्चल मर्यादाको धारण करनेवाले हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी अचल स्थित था अर्थात् सदा निश्चल रहनेवाला था, जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव उत्तुङ्ग अर्थात् उत्तम हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी उत्तुङ्ग अर्थात् ऊँचा था, जिनेन्द्रदेव जिस प्रकार शुद्धिभाक् हैं अर्थात् राग, द्वेष आदि कर्म विकारसे रहित होनेके कारण निर्मल हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी शुद्धिभाक्था अर्थात् धूलि, कंटक आदिसे रहित होनेके कारण स्वच्छ था और जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव जगत्के गुरु हैं इसी प्रकार वह पर्वत मो जगत्में श्रेष्ठ अथवा उसका गौरव स्वरूप था ॥१७१।। अथवा वह पर्वत जगत्के विधातात्मा जिनेन्द्रदेवका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव अक्षर-अर्थात् विनाशरहित हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी प्रलय आदिके न पड़नेसे विनाशरहित था, जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव अभेद्य हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी अभेद्यथा अर्थात् वन आदि १. नक्षत्राणि । २. अधःकृत्य । ३. -रनिलाहतः । ४. विस्तार । ५. सर्वथा। ६. धृतायामः । ७. कृतप्रहसनम् । ८. रजतपर्वतः । ९. कुलपर्वतान् । १०. विजयेन ऋद्धः प्रवृद्धः विजयाः तस्य भावस्ताम् । पपोदरादिगणत्वात् । ११. नर्मल्य, पक्षे विशुद्धपरिणाम । १२. जगति गुरुम्, पक्षे त्रिजगद्गुरुम् । १३. अनश्वरत्वात् । १४. जिनेश्वरस्य । १५. अनुकृतिम् ।।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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