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________________ अष्टादशं पर्व ३९९ तिष्ठेदेकं दिनं द्वे वा कामं त्रिचतुराणि वा। परं 'मासावधेस्तिष्यन्नस्मान् क्लेशयताशिता ॥२०॥ कामं तिष्ठनु वा भुक्त्वा पोत्या निर्वाप्य नः पुनः । अनाश्वान्नि प्रतीकारः तिष्ठन्निष्ठा करोति नः॥२१॥ साध्यं किमथवोदिश्य तिष्ठे दूर्ध्वजुरीशिता । पाइँगुण्ये पठितो नैष गुणः कोपि महीक्षिताम् ॥२२॥ अनेकोपवाकीणे वनेऽस्मिन् रक्षया विना । तिष्ठन्न नीतिविद भर्ता रक्ष्यो यात्मा प्रयत्नतः ॥२३॥ प्रायः प्राणेषु निर्विण्णो देहमुत्स्रष्टु मीहते । निर्विण्णा' वयमंतेन तपसा प्राणहारिणा ॥२४॥ वन्यः कशिपुभिस्तावत् कन्दमूलफलादिभिः । प्राणयात्रां करिष्यामो यावद्योगावधिगुरोः ॥२५॥ इति दीनतरं केचिनियंपेक्षास्तपोविधी । ब्रुवाणाः कातरा दीनां वृत्ति प्रत्युन्मुखाः स्थिताः ॥२६॥ परे परापरज्ञं तं परितोऽभ्यर्णवर्तिनः । इति कर्तव्यतामूढाः तस्थुरन्तश्चलाचलाः" ॥२७॥ शयाने शयितं भुक्तं भुझाने तिष्ठति स्थितम् । मतं गच्छति राज्यस्थे तपःस्थेऽप्यास्थितं तपः ॥२८॥ हम समझते थे कि भगवान् एक दिन, दो दिन अथवा ज्यादासे-ज्यादा तीन चार दिन तक खड़े रहेंगे परन्तु यह भगवान् तो महीनों पर्यन्त खड़े रहकर हम लोगोंको क्लेशित ( दुःखी) कर रहे हैं ॥२०॥ अथवा यदि स्वयं भोजन पान कर और हम लोगोंको भी भोजन पान आदिसे सन्तुष्ट कर फिर खड़े रहते तो अच्छी तरह खड़े रहते, कोई हानि नहीं थी परन्तु यह तो बिलकुल ही उपवास धारण कर भूख-प्यास आदिका कुछ भी प्रतीकार नहीं करते और इस प्रकार खड़े रहकर हम लोगोंका नाश कर रहे हैं।।२१।। अथवा न जाने किस कार्यके उद्देश्यसे भगवान इस प्रकार खड़े हुए हैं । राजाओंके जो सन्धि, विग्रह आदि छह गुण होते हैं उनमें इस प्रकार खड़े रहना ऐसा कोई भी गुण नहीं पढ़ा है ॥२२॥ अनेक उपद्रवोंसे भरे हुए इस वनमें अपनी रमाके बिना ही जो भगवान् खड़े हुए हैं उससे ऐसा मालूम होता है कि यह नीतिके जानकार नहीं हैं क्योंकि अपनी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए ॥२३॥ भगवान् प्रायः प्राणोंसे विरक्त होकर शरीर छोड़नेकी चेष्टा करते हैं परन्तु हम लोग प्राणहरण करनेवाले इस तपसे ही खिन्न हो गये हैं ॥२४|| इसलिए जबतक भगवानके योगकी अवधि है अर्थात् जबतक इनका ध्यान समाप्त नहीं होता तबतक हम लोग वनमें उत्पन्न हुए कन्द, मूल, फल आदिके द्वारा ही अपनी प्राणयात्रा (जीवन निर्वाह) करेंगे ।।२५।। इस प्रकार कितने ही कातर पुरुप तपस्यासे उदासीन होकर अत्यन्त दीन वचन कहते हुए दीनवृत्ति धारण करने के लिए तैयार हो गये ।।२६।। हमें क्या करना चाहिए इस विषयमें मूर्ख रहनेवाले कितने ही मुनि पूर्वापर (आगा-पीछा) जाननेवाले भगवान्के चारों ओर समीप ही खड़े हो गये और अपने अन्तःकरणको कभी निश्चल तथा कभी चंचल करने लगे। भावार्थ-कितने ही मुनि समझते थे कि भगवान् पूर्वापरके जाननेवाले हैं इसलिए हम लोगोंके पूर्वापरका भी विचार कर हम लोगोंसे कुछ-न-कुछ अवश्य कहेंगे ऐसा विचारकर उनके समीप ही उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये । उस समय जब वे भगवान्के गुणोंकी ओर दृष्टि डालते थे तब उन्हें कुछ धैर्य प्राप्त होता था और जब अपनी दीन अवस्थापर दृष्टि डालते थे तब उनकी बुद्धि चंचल हो जाती थी-उनका धैर्य छूट जाता था॥२७॥ वे मुनि परस्परमें कह रहे थे कि जब भगवान राज्य में स्थित थे अर्थात् राज्य करते थे तब हम उनके सो जानेपर सोते थे, भोजन कर चुकनेपर भोजन करते थे, खड़े होनेपर खड़े रहते थे और गमन करनेपर गमन करते थे तथा अब जब भगवान तपमें स्थित हुए अर्थात् जब १. बहुमासम् (?)। २. सन्तर्प्य । ३. अनशनवान् । ४. -निःप्रतीकारः अ०, प० । ५. नाशम् । ६. ऊर्ध्वजानुः । -दूर्वज्ञं योशिता अ० । ७. सन्धिविग्रहयानासनद्वैधाश्रयलक्षणे । ८. क्षत्रियाणाम् । ९. विरक्तः । १०. त्यक्तुम् । ११. विरक्ताः। १२. वनभवैः । १३. अशनाच्छादनः । 'कशिपुर्भोजनावादी'। १४. प्राणप्रवृत्तिम् । १५. पूर्वापर विदम् । १६. अन्तरङ्गे पञ्चलाः । १७. आश्रितम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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