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________________ ३९६ आदिपुराणम् स्तुतिभिरनुगतार्थालंक्रियाश्लाघिनीभिः प्रकटितगुरुमक्तिः कल्मषध्वंसिनीमिः । सममवनिपपुत्रः स्वानुजन्मानुयातो भरतपतिरुहारश्रीरयोध्योन्मुखोऽभूत् ॥२५॥ अथ सरसिजबन्धौ मन्दमन्दायमानैः परिमृशति कराः पश्चिमाशाङ्गनास्यम् । धुवति मरुति मन्दं प्रोल्लसस्केतुमालां प्रभुरविशदलायां स्वामिवाज्ञामयोध्याम् ॥२५॥ शार्दूलविक्रीडितम् तग्रस्थो गुरुमादरात् परिचरन् दूरादुदारोदयः कुर्वन् सर्वजनोपकारकरणी वृत्ति स्वराज्यस्थिता । तन्वानःप्रमदं समामिषु गुरून संभावयन् सादरं भावी चक्रधरीधरां चिरमपादेकातपत्राङ्किताम् ॥२५६॥ इत्थं निष्क्रमणे गुरोः समुचितं कृत्वा सपर्याविधि प्रत्यावृत्य पुरी निजामनुगतो राजाधिराजोऽनुजः । प्रातः प्रातरनूत्थितो नृपगणैर्मक्त्या गुरोः संस्मरन् दिक्चक्रं विधुतारिचक्रमभुनक् पूर्व यथासौ जिनः।२५७ इत्याचे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहे भगवत्परिनिष्क्रमणं नाम सप्तदशं पर्व ॥१७॥ maram समूहसे भगवानके चरणकमलोंका प्रक्षालन करते हुए भक्तिसे नम्र हुए अपने मस्तकसे उन्हीं भगवान के चरणोंको नमस्कार किया।२५३।। जिन्होंने उत्तम-उत्तम अर्थ तथा अलंकारोंसे प्रशंसा करने योग्य और पापोंको नष्ट करनेवाली अनेक स्तुतियोंसे गुरुभक्ति प्रकट की है और जो बड़ी भारी विभूतिसे सहित हैं ऐसे राजा भरत अनेक राजपुत्रों और अपने छोटे भाइयोंके साथ-साथ अयोध्याके सम्मुख हुए ॥२५४|| ___ अथानन्तर जब सूर्य अपनी मन्द-मन्द किरणोंके अग्रभागसे पश्चिम दिशारूपी स्त्रीके मुखका स्पर्श कर रहा था और वायु शोभायमान पताकाओंके समूहको धीरे-धीरे हिला रहा था तब अपनी आज्ञाके समान उल्लंघन करनेके अयोग्य अयोध्यापुरीमें महाराज भरतने प्रवेश किया ॥२५५।। जो बड़े भारी अभ्युदयके धारक हैं और जो भावी चक्रवर्ती हैं ऐसे राजा भरत उसी अयोध्यापुरीमें रहकर दूरसे ही आदरपूर्वक भगवान् वृषभदेवकी परिचर्या करते थे, उन्होंने अपने राज्यमें सब मनुष्योंका उपकार करनेवाली वृत्ति (आजीविका) का विस्तार किया था, वे अपने भाइयोंको सदा हर्षित रखते थे और गुरुजनोंका आदरसहित सम्मान करते थे। इस प्रकार वे केवल एक छत्रसे चिह्नित पृथिवीका चिर काल तक पालन करते रहे ।।२५६॥ इस प्रकार राजाधिराज भरत तपकल्याणकके समय भगवान् वृषभदेवकी यथोचित पूजा कर छोटे भाइयोंके साथ-साथ अपनी अयोध्यापुरीमें लौटे और वहाँ जिस प्रकार पहले जिनेन्द्रदेव भगवान् वृषभनाथ दिशाओंका पालन करते थे उसी प्रकार वे भी प्रतिदिन प्रातःकाल राजाओंके समूहके साथ उठकर भक्तिपूर्वक गुरुदेवका स्मरण करते हुए शत्रुमण्डलको नष्ट कर समस्त दिशाओंका पालन करने लगे ।।२५७॥ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवजिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहमें भगवान्के तप-कल्याणकका वर्णन करनेवाला सत्रहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१७॥ १. अनुगतः । २. वाति सति । ३. परमेश्वरम् । ४. अतिशयात् । ५. स्थिताम् प०, म । स्थितिम् द०। ६. नाभिराजादीन । ७. 'पा रक्षणे' अपालयत् । ८. प्रत्यागत्य । ९. गुरुं ध्यायन । १०. पालयति स्म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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