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________________ सौख्यैरगाद् धृति' मचिन्त्य धृतिः स धीरः पुण्यात् सुखं न सुखमस्ति विनेह पुण्याद् पुण्यं च दानद संयम सत्य शौच ។ पुण्यार्जने कुरुत यत्नमतो बुधेन्द्राः ॥ २७० ॥ प्रापय्य षोडशं प पुण्यात् सुरासुरनरोरगभोगसाराः १४ साम्राज्य मैन्द्र पुन " भवभावनम् १८ १२ बीजाद्विना न हि भवेयुरिह प्ररोहा : * । ० "स्यागमादिशुभचेष्टितमूल' 'मिष्टम् ॥२७१॥ तस्माद् बुधाः कुरुत धर्ममवाप्तुकामाः श्रीरायुरप्रमितरूपसमृद्ध यो धीः 1 आईन्थ्यमन्स्यरहिता' 'खिलसौख्यमग्यूम् ॥२७२॥ स्वर्गापवर्गसुखमग्प्रमचिन्त्य सारम् | 'सोऽभ्युदय भोगमनन्त सौख्य मानन्त्यमापयति धर्मफलं हि शर्म ॥ २७३ ॥ दानं प्रदत्त मुदिता मुनिपुङ्गवेभ्यः पूजां कुरुध्वमुपनम्य च तीर्थ कृद्भ्यः । 1 २५ ३७१ शोलानि पालयत पर्वदिनोपवासान् 'विष्मार्ट मा स्म सुधियः सुखमी प्लत्रश्चेत् ॥ २७४ ॥ असुरोंके गुरु तथा अचिन्त्य धैर्यके धारण करनेवाले भगवान् वृषभदेवको इन्द्र उनके विशाल पुण्यके संयोगसे भोगोपभोगकी सामग्री भेजता रहता था जिससे वे सुखपूर्वक सन्तोषको प्राप्त होते रहते थे । इसलिए हे पण्डितजन, पुण्योपार्जन करनेमें प्रयत्न करो ॥ २७० ॥ | इस संसार में पुण्य से ही सुख प्राप्त होता है । जिस प्रकार बीज के बिना अंकुर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार पुण्यके बिना सुख नहीं होता । दान देना, इन्द्रियोंको वश करना, संयम धारण करना, सत्यभाषण करना, लोभका त्याग करना, और क्षमाभाव धारण करना आदि शुभ चेष्टाओंसे अभिलषित पुण्यकी प्राप्ति होती है ।। २७१ ॥ सुर, असुर, मनुष्य और नागेन्द्र आदिके उत्तमउत्तम भोग, लक्ष्मी, दीर्घ आयु, अनुपम रूप, समृद्धि, उत्तम वाणी, चक्रवर्तीका साम्राज्य, इन्द्रपद, जिसे पाकर फिर संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता ऐसा अरहन्त पद और अन्तरहित समस्त सुख देनेवाला श्रेष्ठ निर्वाण पद इन सभीकी प्राप्ति एक पुण्यसे ही होती है इसलिए है पण्डितजन, यदि स्वर्ग और मोक्षके अचिन्त्य महिमाबाले श्रेष्ठ सुख प्राप्त करना चाहते हो तो धर्म करो क्योंकि वह धर्म ही स्वनोंके भोग और मोक्षके अविनाशी अनन्त सुखकी प्राप्ति कराता है । वास्तव में सुखप्राप्ति होना धर्मका ही फल है ।।२७२-२७३॥ हे सुधीजन, यदि तुम १. सन्तोषम् । २. अचिन्त्यधैर्यः । ३. धियं रातीति धीरः । प्रकृष्टज्ञानीत्यर्थः । ४. अंकुराणि । ५. इन्द्रियनिग्रहः । ६. 'व्रतसमितिकषायदण्डेन्द्रियाणां क्रमेण धारणपालननिग्रहत्यागजयाः संयमः । [ वदसमिदिकसायणं दंडाणं तहिंदियाण पंचन्हं । धारणपालणनिग्गह चागजओ संजमो भणिओ ] - जीवकाण्ड | ७. प्रशस्तजने साधुवचनम् । ८. प्रकर्षलोभनिवृत्तिः । ९. बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहत्यजनम् । १० दुष्टजनकृताक्रोशप्रहसनावज्ञाताड़नादिप्राप्ती कालुष्याभावः क्षमा । ११. कारणम् । १२. गीः स०: । १३. चक्रित्वम् । १४. इन्द्रपदम् । १५. पुनर्न भवतीत्यपुनर्भवः अपुनर्भवभावस्य निष्ठा निष्पत्तिर्यस्य तत् । १६. मोक्षसुखम् । १७. अचिन्त्य माहात्म्यम् । १८. नीत्वा । १९. सः धर्मः । २० प्रदद्ध्त्रम् । 'दाण् दाने लोट' । २१ मा विस्मरत ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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