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________________ षोडश पर्व स्रष्टेति ताः प्रजाः सृष्ट्वा तद्योगभेमसाधनम् । प्रायुङन युक्तितो दण्डं हामाधिक्कारलक्षणम् ॥२५॥ दुष्टानां निग्रहः शिष्टप्रतिपालनमित्ययम् । न पुरासीस्क्रमो यस्मात् प्रजाः सर्वा 'निरागसः ॥२५॥ प्रजा दण्डधराभावे मात्स्यं न्यायं श्रयन्त्यमूः । अस्यतेऽन्तःप्रदुष्टेन निर्बलो हि बलीयसा ॥२५२॥ दण्डभीत्या हि लोकोऽयमपथं नानुधावति । युक्तदण्डधरस्तत्मात् पार्थिवः पृथिवीं जयेत् ॥२५॥ पयस्विन्या यथा क्षीरम 'द्रोहणोपजीन्यते । प्रजाप्यवं धनं दोया नातिपीडाकरैः करैः ॥२५४॥ ततो दण्डधरानेता ननुमंने नृपान् प्रभुः । तदायत्तं हि लोकस्य योगक्षेमानुचिन्तनम् ॥२५५॥ . समाहूय महामागान् हर्यकम्पनकाश्यपान् । सोमप्रभं च संमान्य सस्कृत्य च यथोचितम् ॥२५६॥ कृतामिषेचनानेतान् महामण्डलिकान् नृपान् । चतुःसहस्रभूनाथपरिवारान् व्यधाद् विभुः ॥२५७॥ सोमप्रभः प्रमोरातकुरुराजममायः । कुरूणामधिराजोऽभूत् कुरुवंशशिखामणिः ॥२५८॥ हरिश्च हरिकान्ताख्यां दधानस्तदनुज्ञया । हरिवंशमलंचक्रे श्रीमान् हरिपराक्रमः ॥२५९॥ अकम्पनोऽपि सृष्टीशात् प्राप्तश्रीधरनामकः । नाथवंशस्य नेताभूत् प्रसन्ने भुवनेशिनि ॥२६०॥ व्यवस्था होनेसे यह कर्मभूमि कहलाने लगी थी ॥२४९।। इस प्रकार ब्रह्मा-आदिनाथने प्रजाका विभाग कर उनके योग ( नवीन वस्तुकी प्राप्ति ) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा) की व्यवस्थाके लिए युक्तिपूर्वक हा, मा और धिक्कार इन तीन दण्डोंकी व्यवस्था की थी ॥ २५ ॥ दुष्ट पुरुपोंका निग्रह करना अर्थात् उन्हें दण्ड देना और सज्जन पुरुषोंका पालन करना यह क्रम . कर्मभूमिसे पहले अर्थात् भोगभूमिमें नहीं था क्योंकि उस समय पुरुष निरपराध होते थे-किसी प्रकारका अपराध नहीं करते थे।। २५१॥ कर्मभूमिमें दण्ड देनेवाले राजाका अभाव होनेपर प्रजा मात्स्यन्यायका आश्रय करने लगेगी अर्थात् जिस प्रकार बलवान् मच्छ छोटे मच्छोंको खा जाते हैं उसी प्रकार अन्तरंगका दुष्ट बलवान् पुरुष, निर्बल पुरुषको निगल जायेगा ।। २५२ ।। यह लोग दण्डके भयसे कुमार्गकी ओर नहीं दौड़ेंगे इसलिए दण्ड देनेवाले राजाका होना उचित ही है और ऐसा राजा ही पृथिवीको जीत सकता है ।।२५३।। जिस प्रकार दूध देनेवालो गायसे उसे बिना किसी प्रकारकी पीड़ा पहुँचाये दूध दुहा जाता है और ऐसा करनेसे वह गाय भी सुखी रहती है तथा दूध दुहनेवालेकी आजीविका भी चलती रहती है उसी प्रकार राजाको भी प्रजासे धन वसूल करना चाहिए। वह धन अधिक पीड़ा न देनेवाले करों (टैक्सों) से वसूल किया जा सकता है। ऐसा करनेसे प्रजा भी दुखी नहीं होती और राज्यव्यवस्थाके लिए योग्य धन भी सरलतासे मिल जाता है ।।२५४।। इसलिए भगवान् वृषभदेवने नीचे लिखे हुए पुरुपोंको दण्डधर (प्रजाको दण्ड देनेवाला) राजा बनाया है सो ठीक ही है क्योंकि प्रजाके योग और क्षेमका विचार करना उन राजाओंके ही अधीन होता है ।। २५५ ।। भगवान्ने हरि, अकम्पन, काश्यप और सोमप्रभ इन चार महा भाग्यशाली क्षत्रियोंको बुलाकर उनका यथोचित सम्मान और सत्कार किया। तदनन्तर राज्याभिषेक कर उन्हें महामाण्डलिक राजा बनाया। ये राजा चार हजार अन्य छोटे-छोटे राजाओंके अधिपति थे ।। २५६-२५७ ।। सोमप्रभ, भगवान्से कुरुराज नाम पाकर कुरुदेशका राजा हुआ और कुरुवंशका शिखामणि कहलाया।।२५८॥ हरि, भगवानकी आज्ञासे हरिकान्त नामको धारण करता हुआ हरिवंशको अलंकृत करने लगा क्योंकि वह श्रीमान् हरिपराक्रम अथात् इन्द्र अथवा सिंहके समान पराक्रमी था । २५९ ।। अकम्पन भी, १. निर्दोषाः । २. दण्डकरः अ०, १०, स०, म०, द०, ल०। ३. क्षीरवढेनोः। द्रवेण । ५. वर्धते । ६. वक्ष्यमाणान् । ७. चतुः महनराजपरिवारान् । ४. अनुप
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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