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________________ १२ षोडशं पर्व ३६७ नाभिराजः स्वहस्तेन मौलिमारोपयत् प्रभोः । महाम'कुटबद्वानामधिराड् भगवानिति ॥२२॥ पबन्धोर्जगद्बन्धोर्ललाटे विनिवेशितः । बन्धनं राजलक्ष्म्याः स्विद्गत्वर्याः स्थैर्यसाधनम् ॥२३॥ नवी सदंशुकः कर्णद्वयोल्लसितकुण्डलः । दधानो मकुटं मूर्ना लक्ष्म्याः क्रीडाचलायितम् ॥२३४॥ कण्ठे हारलतां बिभ्रत् कटिसूत्रं कटीतटे । ब्रह्मसूत्रो पवीताङ्गः स गाङ्गौघमिवाद्रिराट् ॥२३५॥ कटकाङ्गदकेयूरभूषितायतदोर्युगः । पर्युल्लसन्महाशाखः कल्पशाखीव जङ्गमः ॥२३६॥ सनीलरत्ननिर्माणन पुरावुद्वहस्क्रमौ । निलीनभृजसंफुल्करक्ततामरसश्रियौ ॥२३७॥ इति प्रत्यङ्ग संगिन्या बभौ भूषणसम्पदा । मगवानादिमो ब्रह्मा भूषणाङ्ग इवाधिपः ॥२३८॥ ततः सानन्दमानन्दनाटकं नाव्यवेदवित् । प्रयुज्यास्थायिका रङ्ग प्रत्यगाद् गां सहस्रगुः ॥२३९॥ व्रजन्तमनुजग्मुस्तं कृतकार्या सुरासुराः । भगवत्पादसंसेवानियुक्तस्वान्तवृत्तयः ॥२४०॥ अथाधिराज्यमासाद्य नाभिराजस्य संनिधौ । प्रजानां पालने यत्नमकरोदिति विश्वसृट् ॥२४॥ कृत्वादितः प्रजासगं" तद्वृ त्तिनियमं पुनः । स्वधर्मानतिवृत्त्यैव नियच्छन्नन्वशात् प्रजाः ॥२४२॥ 'महामुकुटबद्ध राजाओंके अधिपति भगवान् वृषभदेव ही हैं। यह कहते हुए महाराज नाभिराजने अपने मस्तकका मुकुट अपने हाथसे उतारकर भगवान्के मस्तकपर धारण किया था ।।२३२।। जगत् मात्रके बन्धु भगवान् वृषभदेवके ललाटपर पट्टबन्ध भी रखा जो कि ऐसा मालूम होता था मानो यहाँ-वहाँ भागनेवाली-चंचल राज्यलक्ष्मीको स्थिर करनेवाला एक बन्धन ही हो ॥२३॥ उस समय भगवान् मालाएँ पहने हुए थे, उत्तम वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके दोनों कानों में कुण्डल सुशोभित हो रहे थे। वे मस्तकपर लक्ष्मीके क्रीड़ाचलके समान मुकुट धारण किये हुए थे, कण्ठमें हारलता और कमरमें करधनी पहने हुए थे। जिस प्रकार हिमवान् पर्वत गंगाका प्रवाह धारण करता है उसी प्रकार वे भी अपने कन्धेपर यज्ञोपवीत धारण किये थे। उनकी दोनों लम्बी भुजाएँ कड़े, वाजूबन्द और अनन्त आदि आभपणोंसे विभूषित थीं। उन भुजाओंसे भगवान् ऐसे मालूम होते थे मानो शोभायमान बड़ी-बड़ी शाखाओंसे सहित चलता-फिरता कल्पवृक्ष ही हों। उनके चरण नीलमणिके बने हुए नूपुरोंसे सहित थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो जिनपर भ्रमर बैठे हुए हैं ऐसे खिले हुए दो लाल कमल हो हों। इस प्रकार प्रत्येक अंगमें पहने हुए आभूषणरूपी सम्पदासे आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेव ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भूषणांग जातिके कल्पवृक्ष ही हों ।।२३४-२३८।। तदनन्तर नाट्यशास्त्रको जाननेवाला इन्द्र उस सभारूपी रंगभूमिमें आनन्दके साथ आनन्द नामका नाटक कर स्वर्गको चला गया ।।२३९॥ जो अपना कार्य समाप्त कर चुके हैं और जिनके चित्तकी वृत्ति भगवानके चरणोंकी सेवा में लगी हुई है ऐसे देव और असुर उस इन्द्रके साथ ही अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥२४॥ अथानन्तर कर्मभूमिकी रचना करनेवाले भगवान वृषभदेवने राज्य पाकर महाराज नाभिराजके समीप ही प्रजाका पालन करनेके लिए नीचे लिखे अनुसार प्रयत्न किया ।।२४१॥ भगवान्ने सबसे पहले प्रजाकी सृष्टि (विभाग आदि) की फिर उसकी आजीविकाके नियम बनाये और फिर वह अपनी-अपनी मर्यादाका उल्लंघन न कर सके इस प्रकारके नियम बनाये। १. मुकुट अ०, ५०, स०, म०, ल०। २. इव । ३. गमनशीलायाः। ४. स्थिरत्वस्य कारणम। ५. मुकुटं -अ०, १०, स०, म०, ल०। ६. वेष्टितशरीरः । ७. इवांहिपः प० । ८. सभारते। ९. स्वर्गम । १०. सहस्राक्षः । ११. सुष्टिम् । १२. वर्तनम् । १३. नियमयन् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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