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________________ ३५६ आदिपुराणम समवादीधरद ब्राह्मी मंधाविन्यतिसुन्दरी । सुन्दरी गणितं स्थानक्रमैः सम्यगधारयत् ॥१०॥ न विना वाङ्मयात् किंचिदस्ति शामं कलापि वा। ततो वारुमयमवादी वेधास्ताभ्यामुपादिशत् ॥१०॥ मुमेधसावसंमोहादध्यषातां गुरोमुखात् । वाग्देव्याविव निश्शेष वाङ्मयं ग्रन्थतोऽर्थतः ॥११॥ . "पदविद्यामधिग्छन्दोविचितिं वागलंकृतिम् । यी समुदितामेतां तद्विदो वाहमयं विदुः ॥११॥ तदा स्वायंभुवं नाम पदशास्त्रमभून् महत् । यत्तत्परशताध्यायरतिगम्भीरमधिवत् ॥११२॥ छन्दोविचितिमप्ये नानाध्यायरुपादिशत् । उकात्युकादिभेदांश्च षडविंशतिमदीरशत् ॥११३॥..... प्रस्तारं नष्टमुद्दिष्टमंकद्वित्रिलघुक्रियाम् । संख्यामथाध्वयोगं च व्याजहार गिरीपतिः ॥११४॥ उपमादीनलंकारास्तन्मार्गद्वयविस्तरम् । दश प्राणानलंकारसंग्रह विभुरभ्यधात् ॥११५॥ अथैनयोः पदज्ञान'दीपिकामिः प्रकाशिताः । कलाविद्याश निश्शेषाः स्वयं परिणतिं ययुः ॥११६॥ इतिहाधीतनिश्शेषविद्ये ते गुर्वनुग्रहात् । वाग्देवतावताराय कन्ये पात्रत्वमीयतुः ॥११७॥ किया और अतिशय सुन्दरी सुन्दरीदेवीने इकाई दहाई आदि स्थानोंके क्रमसे गणित शास्त्रको अच्छी तरह धारण किया ॥१०५-१०८।। वाङ्मयके बिना न तो कोई शान है और न कोई कला है इसलिए भगवान वृषभदेवने सबसे पहले उन पुत्रियों के लिए वाङ्मयका उपदेश दिया था॥ १०९ ।। अत्यन्त बुद्धिमती उन कन्याओंने सरस्वती देवीके समान अपने पिताके मुखसे संशय विपर्यय आदि दोपोंसे रहित शब्द तथा अर्थ रूप समस्त वाङ्मयका अध्ययन किया था ॥ ११० ॥ वाङ्मयके जाननेवाले गणधरादि देव व्याकरण शास्त्र, छन्दशास्त्र और अलंकार शास्त्र इन तीनोंके समूहको वाङ्मय कहते हैं ।। १११ । उस समय स्वयम्भू अर्थात् भगवान वृषभदेवका बनाया हुआ एक बड़ा भारी व्याकरण शास्त्र प्रसिद्ध हुआ था उसमें सौसे भी अधिक अध्याय थे और वह समुद्र के समान अत्यन्त गम्भीर था ॥११२।। इसी प्रकार उन्होंने अनेक अध्यायोंमें छन्दशास्त्रका भी उपदेश दिया था और उसके उक्ता अत्युक्ता आदि छब्बीस भेद भी दिखलाये थे ।। ११३ ।। अनेक विद्याओंके अधिपति भगवान्ने प्रस्तार, नष्ट, उदिष्ट, एकद्वित्रिलघुक्रिया, संख्या और अध्वयोग छन्दशासके इन छह प्रत्ययोंका भी निरूपण किया था ।। ११४ ॥ भगवान्ने अलंकारोंका संग्रह करते समय अथवा अलंकारसंग्रह ग्रन्थमें उपमा रूपक यमक आदि अलंकारोंका कथन किया था, उनके शब्दालंकार और अर्थालंकार रूप दो मागौंका विस्तारके साथ वर्णन किया था और माधुर्य ओज आदि दश प्राण अर्थात् गुणोंका भी निरूपण किया था ॥ ११५ ॥ ___अथानन्तर ब्राझी और सुन्दरी दोनों पुत्रियोंकी पदज्ञान (व्याकरण-ज्ञान) रूपी दीपिकासे प्रकाशित हुई समस्त विद्याएँ और कलाएँ अपने आप ही परिपक्व अवस्थाको प्राप्त हो गयी थीं ॥११६।। इस प्रकार गुरु अथवा पिताके अनुग्रहसे जिनने समस्त विद्याएँ पढ़ ली हैं ऐसी वे दोनों पुत्रियाँ सरस्वती देवीके अवतार लेनेके लिए पात्रताको प्राप्त हुई थीं। भावार्थ-वे इतनी अधिक ज्ञानवती हो गयी थीं कि साक्षात् सरस्वती भी उनमें अवतार ले १. सम्यगवधारयति स्म । २. शब्दतः। ३. व्याकरणशास्त्रम् । ४. शब्दालंकारम । ५. स्वायंभुवं नाम व्याकरणशास्त्रम् । ६. शतात् परे परश्शताः [शतात् पराणि अधिकानि परश्शतानि, परशब्देन समानार्थः । 'परशब्दोऽसन्तः इत्येके । राजदन्तादित्वात्पूर्वनिपातः' । इत्यमोघावृत्तावुक्तम् । वर्चस्कादिषु नमस्कारादय इत्यत्र । इति टिप्पणपुस्तके 'परश्शताः' इति शब्दोपरि टिप्पणी] । ७. मेरुप्रस्तारम् । ८. गौडविदर्भमार्गद्वयम् । ९. "श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता। अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजः कान्तिसमाधयः॥ इति वैदर्भमार्गस्य प्राणा दशगुणा: स्मताः । तेषां विपर्ययः प्रायो लक्ष्यते गौडवमनि ॥" १०. ब्राह्मी मुन्दर्योः । ११. व्याकरणशास्त्रपरिज्ञानप्रदीपिका । १२.इति ह्यधीत प०, अ०, द०, ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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