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________________ ३५२ आदिपुराणम् य'एकशीर्षकः शुद्धहारः स्याच्छीर्षकात्परः । इन्द्रच्छन्दायुपपदः स चैकादशभेदभाक् ॥६३॥ तथोपशीर्षकादीनामपि शुद्धारममा भिदा । ताः शुद्धास्ततो हाराः पञ्चपञ्चाशदेव हि ॥६॥ भवेत् फलकहाराख्यो मणिमध्योऽर्द्रमाणवे । बिहेमफलकः पत्रफलको वा यदा तदा ॥६५॥ सोपानमणिसोपानद्वैविध्यात् स मतो द्विधा । सोपानाख्यस्तु फलकैरोक्मैरन्यः सरत्नकैः ॥६६॥ इत्यमूनि युगारम्भे कण्ठोरोभूषणानि नै । स्रष्टासृजत् स्वपुत्रेभ्यो यथास्वं ते च तान्यधुः ॥६७॥ इस्यायाभरणैः कण्ठ्यैरन्यैश्वान्यन्त्रमाविमिः । ते राजन्या म्यराजन्त ज्योतिर्गणमया इव ॥६॥ तेषु तेजस्विनां धुर्यो भरतोऽर्क इवायुतत् । शशीव जगतः कान्तो युवा बाहुबली बमौ ॥६९॥ शेषाश्च ग्रहनक्षत्रतारागणनिमा बभुः। ग्रामो दीप्तिरितेषामभज्योत्स्नेव सुन्दरी ॥७॥ स तैः परिवृतः पुत्रैः भगवान् वृषभो बभौ । ज्योतिर्मणः परिक्षितो यथा भेरुमहोदयः ॥७१॥ अथैकदा सुखासीनो भगवान् हरिविष्टरे । मनो व्यापारयामास कलाविद्योपदेशने ॥७२॥ तावञ्च पुत्रिक भत्तु मीसुन्दर्यभिष्टवे । तमङ्गलनैपर्थे संप्राप्ते निकटं गुरोः ॥७३॥ शुद्ध हार कहलाता है। यदि शीर्षकके आगे इन्द्रच्छन्द आदि उपपद भी लगा दिये जायें तो वह भी ग्यारह भेदोंसे युक्त हो जाता है ॥६३।। इसी प्रकार उपशीर्षक आदि शुद्ध हारोंके भी ग्यारह-ग्यारह भेद होते हैं। इस प्रकार सब हार पचपन प्रकारके होते हैं ॥३४॥ अर्धमाणव हारके बीच में यदि मणि लगाया गया हो तो उसे फलकहार कहते हैं। उसी फलकहारमें जब सोनेके तीन अथवा पाँच फलक लगे हों तो उसके सोपान और मणिसोपानके भेदसे दो भेद हो जाते हैं। अर्थात् जिसमें सोनेके तीन फलक लगे हों उसे सोपान कहते हैं और जिसमें सोनेके पाँच फलक लगे हों उसे मणिसोपान कहते हैं। इन दोनों हारों में इतनी विशेषता है कि सोपान नामक हारमें सिर्फ सुवर्णके ही फलक रहते हैं और मणिसोपान नामके हारमें रनोंसे जड़े हुए सुवर्णके फलक रहते हैं । (सुवर्णके गोल दाने-गुरिया-को फलक कहते हैं)॥६५-६६।। इस प्रकार कर्मयुगके प्रारम्भमें भगवान् वृषभदेवने अपने पुत्रोंके लिए कण्ठ और वक्षःस्थलके अनेक आभूषण बनाये, और उन पुत्रोंने भी यथायोग्य रूपसे वे आभूषण धारण किये ॥६७॥ इस तरह कण्ठ तथा शरीरके अन्य अवयवोंमें धारण किये हुए आभूषणोंसे वे राजकुमार ऐसे सुशोभित होते थे मानो ज्योतिषी देवोंका समूह हो ॥६८। उन सब राजकुमारों में तेजस्वियों में भी तेजस्वी भरत सूर्यके समान सुशोभित होता था और समस्त संसारसे अत्यन्त सुन्दर युवा बाहुबली चन्द्रमाके समान शोभायमान होता था ॥६॥ शेष राजपुत्र ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणके समान शोभायमान होते थे। उन सब राजपुत्रोंमें ग्रामी दीप्तिके समान और सन्दरी चाँदनीके समान सशोभित होती थी॥७०|| उन सब पत्र-पत्रियोंसे घिरे हए सौभाग्यशाली भगवान् वृषभदेव ज्योतिषी देवोंके समूहसे घिरे हुए ऊँचे मेरु पर्वतकी तरह सुशोभित होते थे॥७॥ अथानन्तर किसी एक समय भगवान् वृषभदेव सिंहासनपर सुखसे बैठे हुए थे, कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओंके उपदेश देने में व्याप्त किया ।।७२।। उसी समय उनकी ब्राझी और सुन्दरी नामकी पुत्रियाँ माङ्गलिक वेष-भूषा धारण कर उनके निकट पहुँची ।।७।। १. एकः शीर्षको यस्मिन् सः शुद्धहारः। २. इन्द्रच्छन्दाद्युपपदः शीर्षकात् परः स हारः इन्द्रच्छन्दशोर्पकहार इति यावत् । एवं शुद्धात्मनामुपशीर्षकादीनामेव इन्दच्छन्दोपशीर्षकहार इति क्रमात् । शीर्षकादिष पञ्चसु इन्द्रच्छन्दादिकं प्रत्येकम् । एकादशधा ताडिते सति पञ्चपञ्चाशत् । ३. वेदेभ्यः । ४. केवल मणि" मध्यश्चेति । ५. अन्यः मणिसोपानः सरत्नः रोक्मफलक: स्यादिति । ६. कण्ठः उरश्च । ७. अभि स्तवे। अभिस्ये इत्यर्थः। ८. मङ्गलालङ्कारे । -नेपथ्ये अ०,५०, द०, स०, म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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