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________________ ३४४ आदिपुराणम् चरमागतयैवास्य वर्णितं बलमाणिकम् । 'सात्त्विकं तु बलं बालिङ्गैर्दिग्विजयादिमिः ॥२१०॥ यद्दलं चक्रभृक्षेत्रवर्तिनां नृसुधाशिनाम् । ततोऽधिकगुणं तस्य बभूव भुजयोर्बलम् ॥२१॥ रूपानुरूपमेवास्य बभूवे गुणसंपदा । गुणैर्विमुच्यते जातु नहि तादृग्विधं वपुः ॥२१२॥ यत्रा कृतिर्गुणास्तत्र वसन्तीति न संशयः । यतोऽस्यानीगाकारो गुणैरेत्य स्वयं वृतः ॥२१३॥ सत्यं शौचं क्षमा त्यागः प्रज्ञोत्साहो दया दमः । प्रशमो विनयश्चेति गुणाः सत्त्वानुषङ्गिणः ॥२१॥ 'वपुः कान्तिश्च दीप्तिश्च लावण्यं प्रियवाक्यता । कलाकुशलता चेति शरीरान्वयिनो गुणाः ॥२१५॥ निसर्गरुचिराकारो गुपौरेभिर्विभूषितः । स रेजे नितरां यद्वन्मणिः संस्कारयोगतः ॥२१६॥ अप्राकृताकृतिदिग्यमनुष्यो महसां निधिः । लक्ष्म्याः पुजोऽयमित्युच्चैबभूवाद्भुतचेष्टितः ॥२१७॥ रूपसंपदमित्युच्चैदृष्ट्वा नान्यत्रमाविनीम् । जनाः पुरातनीमस्य शशंसुः पुण्यसंपदम् ॥२१८॥ वपुरारोग्यमैश्वयं धनर्दिः कामनीयकम् । बलमायुर्यशो मेधा वाक्सौभाग्यं विदग्धता ॥२१९॥ इति यावान् जगत्यस्मिन् पुरुषार्थ: सुखोचितः । स सर्वोभ्युदयः पुण्यपरिपाकादिहाङ्गिनाम् ॥२२०॥ न विनाभ्युदयः पुण्यादस्ति कश्चन पुष्कलः । तस्मादभ्युदय प्रेप्सुः पुण्यं संचिनु याद् बुधः ॥२२॥ कौन सहन कर सकता था ॥२०९।। उसके शरीरसम्बन्धी बलका वर्णन केवल इतने ही से हो जाता है कि वह चरम शरीरी था अर्थात् उसी शरीरसे मोक्ष जानेवाला था और उसके आत्मा सम्बन्धी बलका वर्णन दिग्विजय आदि बाह्य चिह्नोंसे हो जाता है ।।२१०।। चक्रवर्तीके क्षेत्रमें रहनेवाले समस्त मनुष्य और देवोंमें जितना बल होता है उससे कईगुना अधिक बल चक्रवर्तीकी भुजाओंमें था ॥२११॥ उस भरतके रूपके अनुरूप ही उसमें गुणरूपी सम्पदा विद्यमान थी सो ठीक ही है क्योंकि गुणोंसे वैसा सुन्दर शरीर कभी नहीं छोड़ा जा सकता ।।२१२।। 'जहाँ सुन्दर आकार है वहीं गुण निवास करते हैं। इस लोकोक्तिमें कुछ भी संशय नहीं है क्योंकि गुणोंने भरतके उपमारहित-सुन्दर शरीरको स्वयं आकर स्वीकृत किया था ॥२१३।। सत्य, शौच, क्षमा, त्याग, प्रज्ञा, उत्साह, दया, दम, प्रशम और विनय-ये गुण सदा उसकी आत्माके साथ-साथ रहते थे ॥२१४॥ शरीरकी कान्ति, दीप्ति, लावण्य, प्रिय वचन बोलना और कलाओंमें कुशलता ये उसके शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले गुण थे ॥२१५।। जिस प्रकार स्वभावसे ही सुन्दर मणि संस्कारके योगसे अत्यन्त सुशोभित हो जाता है उसी प्रकार स्वभावसे ही सुन्दर आकारवाला भरत ऊपर लिखे हुए गुणोंसे और भी अधिक सुशोभित हो गया था ।।२१६|| वह भरत एक दिव्य मनुष्य था, उसकी आकृति भी असाधारण थी, वह तेजका खजाना था और उसकी सब चेष्टाएँ आश्चर्य करनेवाली थीं इसलिए वह लक्ष्मीके अतिशय ऊँचे पुंजके समान शोभायमान होता था ।।२१७॥ दूसरी जगह नहीं पायी जानेवाली उसकी उत्कृष्ट रूपसम्पदा देखकर लोग उसके पूर्वभव-सम्बन्धी पुण्यसंपदाकी प्रशंसा करते थे।।२१८|| सुन्दर शरीर, नीरोगता, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति, सुन्दरता, बल, आयु, यश, बुद्धि, सर्वप्रिय वचन और चतुरता आदि इस संसारमें जितना कुछ सुखका कारण पुरुषार्थ है वह सब अभ्यदय कहलाता है और वह सब संसारी जीवोंको पुण्यके उदयसे प्राप्त होता है ।।२१९-२२०|| पुण्यके बिना किसी भी बड़े अभ्युदयकी प्राप्ति नहीं होती, इसलिए जो विद्वान् पुरुष अभ्युदय १. आत्मनि भवं मनोजनितमित्यर्थः । २. गुणसंपद् बभूव । ३. स्वरूपत्वम् । ४. दयादमौ प० । ५. सत्त्वाविनाभाविनः । ६. वपुः पुष्टिः । ७. असाधारणाकृतिः। ८. पुरुषार्थसुखोचितः अ०, ब०, स० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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