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________________ पञ्चदशं पर्व ३३५ तारका गगनाम्भोधौ मुक्ताफलनिमश्रियः । 'अरुणौनिलेनेमा विलीयन्ते गतस्विषः ॥१०९॥ सरितां सैकतादेव चक्रवाको रुवन् रुवन् । अन्विच्छति निजां कान्तां निशाविरहविक्लवः ॥१०॥ अयं हंसयुवा हंस्या सुषुप्सति समं सति । मृणालशकलेनाङ्गं कण्डूयश्चम्चुलम्बिना ॥११॥ अब्जिनीयमितो धत्ते विकसत्पङ्कजाननम् । इतश्च म्लानिमासाय नम्रास्येयं कुमुदती ॥११२॥ सरसां पुलिनेष्वेताः कुरर्यः कुर्वते रुतम् । युष्मन्नपुरसंवादि तारं मधुरमेव च ॥११३॥ स्वनीडादुत्पतन्यच कृतकोलाहलस्वनाः । प्रमातमङ्गलानीव पठन्तोऽमी शकुन्तयः ॥११४॥ अप्राप्तस्त्रैणसंस्कारा परिक्षीणदशा इमे । कान्चुकीयः समं दीपा यान्ति कालेन मन्दताम् ॥११५॥ इतो निजगृहे देवि स्वन्मालविधित्सया'। कुम्जवामनिकाप्रायः परिवारःप्रतीच्छति ॥१६॥ विमुञ शयनं तस्मात् नदीपुलिनसंनिमम् । हंसीव राजहंसस्य वल्लभा मानसाश्रया ॥११॥ इस्युच्चैर्वन्दिवृन्देषु पठत्सु समयोचितम् । प्राबोधिकानकध्वानैः सा विनिद्रामवच्छनैः ॥११८॥ विमुक्तायना चैषा कृतमङ्गलमज्जना । प्रष्टुकामा स्वदृष्टानां स्वप्नानां तत्त्वतः फलम् ॥११९॥ ये संसारकी विचित्रताका उपदेश देनेके लिए ही उद्यत हुए हों ॥१०८।। हे देवि, आकाशरूपी समुद्रमें मोतियोंके समान शोभायमान रहनेवाले ये तारे सूर्यरूपी बड़वानलके द्वारा कान्तिरहित होकर विलीन होते जा रहे हैं ।।१०९।। रात-भर विरहसे व्याकुल हुआ यह चकवा नदीके बालूके टीलेपर स्थित होकर रोता-रोता ही अपनी प्यारी स्त्री चकवीको ढूँढ़ रहा है ।।११०॥ हे सति, इधर यह जवान हंस चोंच में दबाये हुए मृणाल-सपरसे शरीरको खुजलाता हुआ हंसीके साथ शयन करना चाहता है ॥११॥ हे देवि, इधर यह कमलिनी अपने विकसित कमलरूपी मुखको धारण कर रही है और इधर यह कुमुदिनी मुरझाकर नम्रमुख हो रही है अर्थात् मुरझाये हुए कुमुदको नीचा कर रही है ॥११२।। इधर तालाबके किनारोपर ये कुरर पक्षियोंकी सियाँ तुम्हारे नूपुरके समान उच्च और मधुर शब्द कर रही हैं ॥११३।। इस समय ये पक्षी कोलाहल करते हुए अपने-अपने घोंसलोंसे उड़ रहे हैं और ऐसे जान पड़ते हैं मानो प्रातःकालका मंगल-पाठ ही पढ़ रहे हों ॥११४। इधर प्रातःकालका समय पाकर ये दीपक कंचुकियों (राजाओंके अन्तःपुरमें रहनेवाले वृद्ध या नपुंसक पहरेदारों) के साथ-साथ ही मन्दताको प्राप्त हो रहे हैं क्योंकि जिस प्रकार कंचुकी स्त्रियोंके संस्कारसे रहित होते हैं उसी प्रकार दीपक भी प्रातःकाल होनेपर स्त्रियोंके द्वारा की हुई सजावटसे रहित हो रहे हैं और कंचुकी जिस प्रकार परिक्षीण दशा अर्थात् वृद्ध अवस्थाको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार दीपक भी परिक्षीण दशा अर्थात् क्षीण बत्तीवाले हो रहे हैं ॥११५।। हे देवि, इधर तुम्हारे घरमें तुम्हारा मंगल करनेकी इच्छासे यह कुब्जक तथा वामन आदिका परिवार तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है॥११६।। इसलिए जिस प्रकार मानसरोवरपर रहनेवाली, राजहंस पक्षीकी प्रिय वल्लभा-हंसी नदीका किनारा छोड़ . देती है उसी प्रकार भगवान् वृषभदेवके मनमें रहनेवाली और उनकी प्रिय वल्लभा तू भी शय्या छोड़ ॥११७। इस प्रकार जब बन्दीजनोंके समूह जोर-जोरसे मंगल-पाठ पढ़ रहे थे तब यशस्वती महादेवी जगानेवाले दुन्दुभियोंके शब्दोंसे धीरे-धीरे निद्रारहित हुई-जाग उठी ॥११८।। और शय्या छोड़कर प्रातःकालका मंगलस्नान कर प्रीतिसे रोमांचितशरीर हो अपने देखे हुए स्वप्नोंका यथार्थ फल पूछनेके लिए संसारके प्राणियोंके हृदयवर्ती अन्धकारको १. सूर्यसारथिः । २. कुजन् कूजन् । ३. विह्वलः। ४. शयितुमिच्छति । ५. भो पतिव्रते । ६. उत्कोशाः। 'उत्क्रोशकूररी समौ' इत्यभिधानात । ७. रुतिम् प० । ८. सदशम । ९. स्त्रीसंबन्धि । १०. परिक्षीणवतिका । परिनष्टवयस्काः। ११. विधातुमिच्छया। १२. पश्यति । आगच्छति वा तिष्ठति वा। १३. राजश्रेष्ठस्य राजहंसस्य च । 'राजहंसास्तु ते चञ्चूचरणैः लोहितः सिताः ।' इत्यमरः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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