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________________ पञ्चदशं पर्व ३२७ अभारोरुद्वयं धीरः कार्तस्वरविमास्वरम् । लक्ष्मीदेण्या इवान्दोलस्तम्भयुग्मकमुच्चकैः ॥२४॥ . जथे मदनमातङ्गदुर्लङ्घयार्गलविभ्रमे । लक्ष्येवोद्वर्तितं भर्तुः परां कान्तिमवापताम् ॥२५॥ पादारविन्दयोः कान्तिरस्य केनोपमीयते । निजगच्छीसमाश्लेषसौभाग्यमदशालिनोः ॥२६॥ इत्यस्याविरभूत् कान्तिरालकानं नखाग्रतः । नूनमन्यत्र नालब्ध सा प्रतिष्टां स्ववान्छिताम् ॥२७॥ निसर्गसुन्दरं तस्य वपुर्वज्रास्थिबन्धनम् । विषशनायभेद्यत्वं भेजे रुक्मादिसच्छवि ॥२८॥ यत्र वज्रमयास्थीनि 'वर्वलयितानि च । वज्रनाराचभिन्नानि तस्संहननमीशितुः ॥२९॥ 'त्रिदोषजा महातका नास्य देहे न्यधुः पदम् । मरुता "चलितागानां ननु मेरुरगोचरः ॥३०॥ न जरास्य न खेदो वा नोपघातोऽपि जातुचित् । केवलं सुखसागतो"महीतल्पेऽमहीयते ॥३१॥ तदस्य रुरुचे गात्रं परमौदारिकाहयम् । महाभ्युदयनिःश्रेयसार्थानां मूलकारणम् ॥३२॥ "मानोन्मानप्रमाणानामन्यूनाधिकतां श्रितम् । संस्थानमाधमस्यासीचतुरन" समन्ततः ॥३३॥ कर रहा था मानो बिजली और शरदऋतुके बादलोंसेसहित किसी पर्वतका नितम्ब (मध्यभाग) ही हो ॥ २३ ॥ धीर-वीर भगवान् सुवर्णके समान देदीप्यमान जिन दो ऊरुओं (घुटनोंसे ऊपरका भाग) को धारण कर रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी देवीके झूलाके दो ऊँचे स्तम्भ ही हों ॥२४॥ कामदेवरूपी हाथीके उल्लंघन न करने योग्य अर्गलोंके समान शोभायमान भगवानकी दोनों जंघाएँ इस प्रकार उत्कृष्ट कान्तिको प्राप्त हो रही थीं मानो लक्ष्मीदेवीने स्वयं उबटन कर उन्हें उज्ज्वल किया हो ॥२५।। भगवानके दोनों ही चरणकमल तीनों लोकोंकी लक्ष्मीके आलिंगनसे उत्पन्न हुए सौभाग्यके गर्वसे बहुत ही शोभायमान हो रहे थे, संसारमें ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसके कि साथ उनकी उपमा दी जा सके ॥ २६ ॥ इस प्रकार पैरोंके नखके अग्रभागसे लेकर शिरके बालोंके अग्रभाग तक भगवान्के शरीरकी कान्ति प्रकट हो रही थी और ऐसी मालूम होती थी मानो उसे किसी दूसरी जगह अपनी इच्छानुसार स्थान प्राप्त नहीं हुआ था इसलिए वह अनन्य गति होकर भगवान्के शरीर में आ प्रकट हुई हो ॥ २७ ॥ भगवानका शरीर स्वभावसे ही सुन्दर था, वनमय हड़ियोंके बन्धनसे सहित था, विष शस्त्र आदिसे अभेद्य था और इसीलिए वह मेरु प्रर्वतकी कान्तिको प्राप्त हो रहा था ॥२८॥ जिस संहननमें वजमयी हड़ियाँ वसोंसे वेष्टित होती हैं और वमयी कीलोंसे कीलित होती हैं, भगवान् वृषभदेवका वही वजवृषभनाराचसंहनन था ।।२९।। वात, पित्त और कफ इन तीन दोषोंसे उत्पन्न हुई व्याधियाँ भगवानके शरीर में स्थान नहीं कर सकी थीं सो ठीक ही है वृक्ष अथवा अन्य पर्वतोंकों हिलानेवाली वायु मेरु पर्वतपर अपना असर नहीं दिखा सकती॥३०॥ उनके शरीर में न कभी बुढ़ापा आता था, न कभी उन्हें खेद होता था और न कभी उनका उपघात (असमयमें मृत्यु) ही हो सकता था। वे केवल सुखके अधीन होकर पृथिवीरूपी शय्यापर पूजित होते थे ॥ ३१॥ जो महाभ्युदयरूप मोक्षका मूल कारण था ऐसा भगवानका परमौदारिक शरीर अत्यन्त शोभायमान हो रहा था ॥३२॥ भगवान्के शरीरका आकार, लम्बाई-चौड़ाई और. ऊँचाई आदि सब ओर हीनाधिकतासे रहित था, उनका समचतुरस्रसंस्थान था ॥३३॥ १. उत्तेजिते सत्कृते च । २.-राबालाग्र-अ०, ५०, म०, स०, द०, ल०। ३. अलकायादारभ्य। ४. नखानपर्यन्तम् । ५. आश्रयम् । ६.-सच्छविम् स०। ७. वजमयवेष्टनर्वेष्टितानि। ८. वज्रनाराचकीलितानि । ९. वात्तपित्तश्लेष्मजा महाव्याधयः । १०. व्यधुः १०,म०।११. कम्पितवृक्षाणाम् । १२. भूशय्यायाम्। . १३. पज्योऽभत । 'मही वृद्धौ पूजायाम् ।' १४. उत्सेधवलयविस्ताराणाम् । १५. समचतुरस्रम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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