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________________ त्रयोदशं पर्व २८९ यो धत्त स्वनितम्बेन भद्रशालवनं महत् । 'परिधानमिवालीनं घनच्छायैर्महादमैः ॥६॥ मेखलायामथाथायां बिभर्ति नन्दनं वनम् । यः कटीसूत्रदाम नानारत्रमयाधिपम् ॥६९॥ यश्च सौमनसोद्यानं बिभर्ति शुकसच्छवि । सपुष्पमुपसंत्र्याने मिवोल्लसितपल्लवम् ॥७॥ यस्यालंकुरुते कूटपर्यन्तं पाण्डुकं वनम् । माहूतमधुपैः पुष्पैः दधानं शेखरश्रियम् ॥१॥ यस्मिन् प्रतिवन दिक्षु चैत्यवेश्मानि भान्त्यलम् । हसन्तीव घुसन्मानि प्रोन्मिषन्मणिदीप्तिभिः ॥७२॥ हिरण्मयः समुत्तुङ्गो धत्ते यो मौलिविभ्रमम् । जम्बूद्वीपमहीमर्तुलवणाम्मोधिवाससः ॥७३॥ ज्योतिर्गणश्च सातस्यात् यं पर्येति महोदयम् । पुण्याभिषेकसंभारः" पवित्रीकृतमहताम् ॥७॥ आराधयन्ति यं नित्यं चारणाः पुण्यवान्छया । विद्याधराश्च मुदितो जिनेन्द्रमिव सूत्रतम् ॥५॥ देवोत्तरकुरून् यश्च स्वपादगिरिमिः" सदा । आवृत्य पाति निर्वाध तद्धि माहात्म्यमुनतेः ॥७६॥ यस्य कन्दरभागेषु निवसन्ति सुरासुराः । साङ्गनाः स्वर्गमुत्सृज्य नाकशोमापहासिषु ॥७॥ यः पाण्डकवनोद्देशे शुचीः स्फटिकनिर्मिताः । शिला बिभत्ति तीर्थेशाममिषेकक्रियोचिताः ॥७॥ जिसके ऊपर सौधर्म स्वर्गका ऋतुविमान चूड़ामणिको शोभा धारण करता है॥ ६७॥ जो अपने नितम्ब भागपर (मध्यभागपर) घनी छायावाले बड़े-बड़े वृक्षोंसे व्याप्त भद्रशाल नामक महावनको ऐसा धारण करता है मानो हरे रंगको धोती ही धारण किये हो॥६वा उससे आगे चलकर अपनी पहली मेखलापर जोअनेक रत्नमयी वृक्षोंसे सुशोभित नन्दन वनको ऐसाधारण कर रहा है मानो उसकी करधनी ही हो ॥६९।। जो पुष्प और पल्लवोंसे शोभायमान हरे रंगके सौमनस वनको ऐसा धारण करता है मानो उसका ओढ़नेका दुपट्टा ही हो ।।७०।। अपनी सुगन्धिसे भौंरोंको बुलानेवाले फूलोंके द्वारा मुकुटकी शोभा धारण करता हुआ पाण्डुक वन जिसके शिखर पर्यन्तके भागको सदा अलंकृत करता रहता है ।।७१। इस प्रकार जिसके चारों वनोंकी प्रत्येक दिशामें एक-एक जिनमन्दिर चमकते हुए मणियोंको कान्तिसे ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो स्वर्गके विमानोंकी हँसी ही कर रहे हों ॥७२॥ जो पर्वत सुवर्णमय है और बहुत ही ऊँचा है इसलिए जो लवणसमुद्ररूपी वस्त्र पहने हुए जम्बूद्वीपरूपी महाराजके सुवर्णमय मुकुटका सन्देह पैदा करता रहता है ।।७।। जो तीर्थकर भगवान्के पवित्र अभिषेककी सामग्री धारण करनेसे सदा पवित्र रहता है और अतिशय ऊँचा अथवा समृद्धिशाली है इसीलिए मानो ज्योतिषी देवोंका समूह सदा जिसकी प्रदक्षिणा दिया करता है।।७४|| जो पर्वत जिनेन्द्रदेवके समान अत्यन्त उन्नत (श्रेष्ठ और ऊँचा) है इसीलिए अनेक चारण मुनि हर्षित होकर पुण्य प्राप्त करनेकी इच्छासे सदा जिसकी सेवा किया करते हैं ।।७।। जो देवकुरु उत्तरकुरु भोगभूमियोंको अपने समीपवर्ती पर्वतोंसे घेरकर सदा निर्बाधरूपसे उनकी रक्षा किया करता है सो ठोक ही है क्योंकि उत्कृष्टताका यही माहात्म्य है ।।७६।। स्वर्गलोककी शोभाकी हँसी करनेवाली जिस पर्वतकी गुफाओंमें देव और धरणेन्द्र स्वर्ग छोड़कर अपनी स्त्रियोंके साथ निवास किया करते हैं ।।७७॥ जो पाण्डुकवनके स्थानों में स्फटिक मणिकी बनी हुई और तीर्थंकरोंके अभिषेक १. अधोंशुकम् । 'परिधानान्यधोंशुके' इत्यभिधानात् । २. विभूते १०, स०, द०, म० । बिभ्रते ल० । ३. यत्कटी-अ०, स०, द० । ४. क्राञ्चोदाम । ५. उत्तरीयवसनम् । -संख्यान-ल०। ६. चूलिकापर्यन्तभूमिम् । ७. प्रतिवनं द०, स०। ८. दीप्यमान । ९. सततमेव सातत्यं तस्मात् । १०. प्रदक्षिणीकरोति । ११. समह । १२. गजदन्तपर्वतैः ।।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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