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________________ २७४ आदिपुराणम् 'समज घातुकं बालं क्षणं नोपेक्षते हरिः। का तुकं खो हिम वाग्छन् समजङ्घा तुकं बलम् ॥२३४॥ [मात्राच्युतकप्रश्नोत्तरम् ] जग्ले कयापि सोस्कण्ठं किमप्याकुल मूर्छनम् । विरहेगनया कान्तसमागमनिराशया ॥२३५॥ [व्यञ्जनच्युतकम् ] ...क: पारमध्यास्ते""क: परुषनिस्वनः ।"कप्रतिष्ठा जीवानांकः पाठ्योऽक्षरच्युतः ॥२३॥ [शुकः परमध्यास्ते काकः परुषनिस्वनः । लोकः प्रतिष्ठा जीवानां श्लोकः पाठ्योऽक्षरच्युतः ॥२३॥ [अक्षरच्युतकप्रश्नोत्तरम् ] मच्छोंसे भयंकर ) ऐसा पाठ कर दिया है। ] ॥२३३।। हे माता, सिंह अपने ऊपर घात करनेवाली हाथियोंकी सेनाकी भण-भरके लिए भी उपेक्षा नहीं करता और हे देवि, शीत ऋतुमें कौन-सी स्त्री क्या चाहती है ? माताने उत्तर दिया कि समान जंघाओंवाली स्त्री शीत ऋतुमें पुत्र ही चाहती है। [इस श्लोकमें पहले चरणके 'बालं' शब्दमें आकारकी मात्रा च्युत कर 'बलं' पाठ पढ़ना चाहिए जिससे उसका 'सेना' अर्थ होने लगता है और अन्तिम चरणके 'बलं' शब्दमें आकारकी मात्रा बढ़ाकर 'बालं' पाठ पढ़ना चाहिए जिससे उसका अर्थ पुत्र होने लगता है। इसी प्रकार प्रथम चरणमें 'समज'के स्थानमें आकारकी मात्रा बढ़ाकर 'साम' पाठ समझना चाहिए जिससे उसका अर्थ 'हाथियोंकी' होने लगता है। इन कारणोंसे यह श्लोक मात्राच्युतक कहलाता है। ] ॥२३४॥ हे माता, कोई त्री अपने पतिके साथ विरह होनेपर उसके समागमसे निराश होकर व्याकुल और मूच्छित होती हुई गद्गद स्वरसे कुछ भी खेदखिन्न हो रही है। [इस श्लोकमें जबतक 'जग्ले' पाठ रहता है और उसका अर्थ 'खेदखिन्न होना' किया जाता है तबतक श्लोकका अर्थ सुसंगत नहीं होता, क्योंकि पतिके समागमको निराशाहोनेपर किसी स्त्रीका गद्गद स्वर नहीं होता और न खेदखिन्न होनेके साथ 'कुछ भी' विशेषणकी सार्थकता दिखती है इसलिए 'जग्ले' पाठमें 'ल' व्यञ्जनको च्युत कर 'जगे' ऐसा पाठ करना चाहिए । उस समय श्लोकका अर्थ इस प्रकार होगा कि-'हे देवि, कोई स्त्री पतिका विरह होनेपर उसके समागमसे निराश होकर स्वरोंके चढ़ाव-उतारको कुछ अव्यवस्थित करती हुई उत्सुकतापूर्वक कुछ भी गा रही है। इस तरह यह श्लोक 'व्यञ्जनच्युतक' कहलाता है ] ॥२३५।। किसी देवीने पूछा कि हे माता, पिंजरेमें कौन रहता है ? कठोर शब्द करनेवाला कौन है ? जीवोंका आधार क्या है ? और अक्षरच्युत होनेपर भी पढ़ने योग्य क्या है ? इन प्रश्नों के उत्तरमै माताने प्रश्नवाचक'क' शनके पहले एक-एक अक्षर और लगाकर उत्तर दे दिया और इस प्रकार करनेसे श्लोकके प्रत्येक पादमें जो एक एक असर कम रहता था उसको भी पूर्ति कर दी जैसे देवीने पूछा था का पंजर मभ्यास्ते' अर्थात् पिजड़े में कौन रहताहै ? माताने उत्तर दिया 'शुकः पंजरमध्यास्ते' अर्थात् पिजड़ेमें तोता रहता है। 'कः परुषनिस्वनः' कठोर शब्द करनेवाला कौन है ? माताने उत्तर दिया 'काकः परुषनिस्वनः' अर्थात कौवा कठोर शब्द करनेवाला है। क:प्रतिष्ठा जीवानाम्' अर्थात् जीवोंका आधार क्याहै ?माताने उत्तर दिया 'लोकःप्रतिष्ठा जीवानाम्' अर्थात् जीवोंका आधार लोक है। और 'कः पाठ्योऽक्षरच्युतः' अर्थात् अक्षरोंसे च्युत होनेपर भी १. समजं सामजम् । धातुकं हिंस्रकम् । का तुकं कास्त्री तुकम् । समजंघा समजं धातुकं बालम्। समजंघा तुर्क बालमिति पदच्छेदः। समाने जड़े यस्याः सा। समं बड़ा कम्बलमिति द्विस्थाने मात्रालोपः । २. उच्चारणकाले मात्राच्युतिः अभिप्रायकथने मेलयेत् । यथा समजमित्यत्र सामजम् । ३. गानपने लकारे लुप्ते जगे, गानं चकार । तदितरपक्षे 'ग्लै हर्षक्षये क्लेशं चकार उवारणकाले व्यञ्जनं नास्ति। अभिप्रायकथने व्यञ्जनमस्ति । यथा जगे इत्यस्य जग्ले क्लेशं चकार । ४. गद्गदकण्ठम् । ५. ईषदाकुलस्वरविश्रामं यथा भवति तथा। ६.'कः सुपजरमध्यास्ते कः सुपरुषनिःस्वनः। कः प्रतिष्ठा सुजीवानां कः [सु] पाठयोऽभरच्युतः ॥' प० । ७. आश्रयः । एतच्छ्लोकस्य प्रश्नोत्तरमुपरिमश्लोके द्रष्टव्यम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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