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________________ द्वादशं पर्व २६१ प्रबोधसमयोऽयं ते देवि सम्मुखमागतः । रचयन् 'दरविलिष्टदलैरज्जैरिवाजालिम् ॥१२॥ विभावरी विमात्यषा दधती विम्बमैन्दवम् । जितं स्वन्मुखकान्त्येव गलज्ज्योत्स्नोपरिच्छदम् ॥१२४॥ विच्छायतां गते चन्द्रबिम्ब मन्दीकृतादरम् । जगदानन्दयस्वच विबुद्धं वन्मुखाम्बुजम् ॥१५॥ दिगङ्गनामुखानीन्दुः संस्पृशन्नस्फुटैः करैः । आपिच्छिषते नूनं प्रवसन्स्वप्रियाङ्गनाः ॥१२६॥ ताराततिरियं ज्योम्नि विरलं लक्ष्यतेऽधुना। विप्रकोणव हारश्रीर्यामिन्या गतिसंभ्रमात् ॥१२७॥ रूयते कलमामन्द्र मितः सरसि सारसैः । स्तोतुकामैरिवास्माभिः समं स्वाम्नात मालेः ॥१२८॥ उच्छ्वसत्कमलास्येयमितोऽधिगृह दोषिकम् । भवन्तीं गायतीवोश्चरन्जिनी भ्रमरारवैः ॥१२९॥ निशाविरहसंतप्तमितश्चक्राहयोर्युगम् । सरस्तरसंस्परिदमावास्यतेऽधुना ॥१३०॥ रथाङ्गमिथुनैरव प्रार्थ्यते "मित्रसन्निधिः । तीव्रमायासितैरन्त: कररिन्दोविंदाहिमिः ॥१३॥ दुनोति कृकवाकूणां ध्वनिरेष समुच्चरन । कान्तासन्नवियोगार्तिपिशुनः कामिनां मनः ॥१३२॥ यदिन्दोः प्राप्तमान्यस्य "नोदस्तं मृदुभिः करैः । तत्प्रलीनं तमो नैशंखरांशानुदयोन्मुखे ॥१३३॥ पाठ पढ़ रहे थे ॥१२२॥ हे देवि, यह तेरे जागनेका समय है जो कि ऐसा मालूम होता है मानो कुछ-कुछ फूले हुए कमलोंके द्वारा तुम्हें हाथ ही जोड़ रहा हो ॥१२३।। तुम्हारे मुखकी कान्तिसे पराजित होनेके कारण ही मानो जिसकी समस्त चाँदनी नष्ट हो गयी है ऐसे चन्द्रमण्डलको धारण करती हुई यह रात्रि कैसी विचित्र शोभायमान हो रही है ।।१२४॥ हे देवि, अब कान्तिरहित चन्द्रमामें जगत्का आदर कम हो गया है इसलिए प्रफुल्लित हुआ यह तेरा मुख-कमल ही समस्त जगत्को आनन्दित करे ॥१२५।। यह चन्द्रमा छिपी हुई किरणों (पक्षमें हाथों) से अपनी दिशारूपी स्त्रियोंके मुखका स्पर्श कर रहा है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो परदेश जानेके लिए अपनी प्यारी स्त्रियोंसे आज्ञाही लेना चाहता हो ॥१२६।। ताराओंका समूह भी अब आकाशमें कहीं-कहीं दिखाई देता है और ऐसा जान पड़ता है मानो जानेकी जल्दीसे रात्रिके हारकी शोभा ही टूट-टूटकर बिखर गयो हो ॥१२७॥ हे देवि, इधर तालाबोंपर ये सारस पक्षी मनोहर और गम्भीर शब्द कर रहे हैं और ऐसे मालूम होते हैं मानो मंगल-पाठ करते हुए हम लोगोंके साथ-साथ तुम्हारी स्तुति ही करना चाहते हों ॥१२८। इधर घरको बावड़ीमें भी कमलिनीके कमलरूपी मुख प्रफुल्लित हो गये हैं और उनपर भौरे शब्द कर रहे हैं जिससे ऐसा मालूम होता है मानो कमलिनी उच्च-स्वरसे आपका यश गा रही हो ॥१२९।। इधर रात्रिमें परस्परके विरहसे अतिशय सन्तप्त हुआ यह चकवा-चकवीका युगल अब तालाबकी तरंगोंके स्पर्शसे कुछ-कुछ आश्वासन प्राप्त कर रहा है ॥१३०॥ अतिशय दाह करनेवाली चन्द्रमाकी किरणोंसे हृदय में अत्यन्त दुःखी हुए चकवा-चकवी अब मित्र (सूर्य) के समागमकी प्रार्थना कर रहे हैं, भावार्थ-जैसे जब कोई किसीके द्वारासताया जाता है तब वह अपने मित्रके साथ समागमकी इच्छा करता है वैसे ही चकवा-चकवी चन्द्रमाके द्वारा सताये जानेपर मित्र अर्थात् सूर्यके समागमकी इच्छा कर रहे हैं ।।१३१।। इधर बहुत जल्दी होनेवाले स्त्रियोंके वियोगसे उत्पन्न हुए दुःखकी सूचना करनेवाली मुर्गोंकी तेज आवाज कामी पुरुषोंके मनको सन्ताप पहुँचा रही है ।।१३२।। शान्तस्वभावी चन्द्रमाकी कोमल किरणोंसे रात्रिका जो अन्धकार १. ईषद् विकसित। २. परिकरः। ३. विकसितम्। ४. अनुज्ञापयितुमिच्छति । ५. गच्छन् । ६. शब्द्यते । 'रु शब्दे'। ७. त्वा त्वाम् । ८. आम्नात अभ्यस्त । त्वामात्तमङ्गलः अ०, ५०, म०, ल.। ९. विकसत्कमलानना। १०. गृहदीपिकायाम् । ११. सूर्यसमीपम् सहायसमीपं वा। १२. परितापयति 'टुदु परितापे' । १३. न नाशितम् । १४. निशाया इदम् । १५. रवी।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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