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________________ २४० आदिपुराणम् स एष परमानन्दं स्वसागतं समुद्वहन् । त्रयस्त्रिंशत्पयोराशिप्रमितायुर्महाद्युतिः ॥१४५॥ समेन चतुरस्नेव संस्थानेनातिसुन्दरम् । हस्तमात्रोच्छितं देहं हंसामं भवलं दधत् ॥१४६॥ सहजांशुकदिग्धनगविभूषाभिरकस्कृतम् । सौन्दर्यस्येव संदोहं दधानो रुचिरं वपुः ॥१४॥ प्रशान्तकलितोदासधीरनेपथ्यविभ्रमः । स्वदेहप्रसरत्योस्नाक्षीराब्धी मग्नविग्रहः ॥१४८॥ स्फुरदामरणोद्योतचोतिताखिलदिक्मुखः । तेजोराधिरिवैकण्यमुपनोतोऽतिमास्वरः ॥१४९॥ विशुद्धलेश्यः शुदेदेहदीधितिदिग्धविक् । सौधेनेव रसेनासनिर्माणः सुख निर्वृतः ॥१०॥ सुभाशिना सुनासीरप्रमुखाणामगोचरम् । संप्राप्तः परमानन्दप्रदं पदमनुत्तमम् ॥ त्रिसहस्राधिक त्रिंशत्सहस्राब्दम्यतिक्रमे । मानसं दिव्यमाहारं स्वसाकुर्वन् अति दधौ ॥१५॥ मासैः षोडशमिः पादशमिश्च दिनैर्मतैः । प्राप्तोच्छवासस्थितिस्तत्र-सोऽहमिन्द्रोऽवसत् सुखम् ॥१५३॥ लोकनाडीगतं योग्यं मूर्तद्रव्यं सपर्ययम् । स्वावधिज्ञानदीपेन द्योतयन् सोऽद्युतत्तराम् ॥१५४॥ तन्मात्र विक्रियां कर्त्तमस्य सामर्थ्यमस्त्यदः । वीतरागस्तु तन्नैवं कुरुते निष्प्रयोजनः ॥१५५॥ नलिनामं मुखं तस्य नेत्रे नीलोत्पलोपमे । कपोलाविन्दु सच्छायो बिम्बकान्तिधरोऽधरः ॥१५६॥ है और न ईर्ष्या ही है । वे केवल सुखमय होकर हर्षयुक्त होते हुए निरन्तर क्रीड़ा करते रहते हैं ॥१४४॥ वह वनाभिका जीव अहमिन्द्र अपने आत्माके अधीन उत्पन्न हुए उत्कृष्ट सुखको धारण करता था, तैंतीस सागर प्रमाण उसकी आयु थी और स्वयं अतिशय देदीप्यमान था॥१४५॥ वह समचतुरस्र संस्थानसे अत्यन्त सुन्दर, एक हाथ ऊँचे और हंसके समान श्वेत शरीरको धारण करता था॥१४६॥ वह साथ-साथ उत्पन्न हुए दिव्य वस्त्र, दिव्य माला और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित जिस मनोहर शरीरको धारण करता था वह ऐसा जान पड़ता था मानो सौन्दर्यका समूह ही हो ॥१४७।। उस अहमिन्द्रकी वेषभूषा तथा विलास-चेष्टाएँ अत्यन्त प्रशान्त थीं, ललित (मनोहर) थीं, उदात्त ( उत्कृष्ट ) थीं और धीर थीं। इसके सिवाय वह स्वयं अपने शरीरकी फैलती हुई प्रभारूपी क्षीरसागरमें सदा निमग्न रहता था ॥१४८। जिसने अपने चमकते हुए आभूषणोंके प्रकाशसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर दिया था ऐसा वह अहमिन्द्र ऐसा जान पड़ता था मानो एकरूपताको प्राप्त हुआ अतिशय प्रकाशमान तेजका समूह ही हो ॥१४। वह विशुद्ध लेश्याका धारक था और अपने शरीरकी शुद्ध तथा प्रकाशमान किरणोंसे दसों दिशाओंको लिप्त करता था, इसलिए सदा सुखी रहनेवाला वह अहमिद्र ऐसा मालूम होता था मानो अमृतरसके द्वारा ही बनाया गया हो ॥१५०॥ इस प्रकार वह अहमिन्द्र ऐसे उत्कृष्ट पदको प्राप्त हुआ जो इन्द्रादि देवोंके भी अगोचर है, परमानन्द देनेवाला है और सबसे श्रेष है॥१५॥ वह अहमिन्द्र तैतीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर मानसिक दिव्य आहार ग्रहण करता हुआ धैर्य धारण करता था ॥१५२।। और सोलह महीने पन्द्रह दिन व्यतीत होनेपर श्वासोच्छ्वास प्रहण करता था। इस प्रकार वह अहमिन्द्र वहाँ (सर्वार्थसिद्धिमें) सुखपूर्वक निवास करता था ॥१५३।। अपने अवधिज्ञानरूपी दीपकके द्वारा त्रसनाडीमें रहनेवाले जामने योग्य मूर्तिक द्रव्योंको उनकी पर्यायोंसहित प्रकाशित करता हुआ वह अहमिन्द्र , अतिशय शोभायमान होता था ॥ १५४ ॥ उस अहमिन्द्रके अपने अवधिज्ञानके क्षेत्र बराबर विक्रिया करनेकी भी सामर्थ्य थी, परन्तु वह रागरहित होनेके कारण बिना प्रयोजन कभी विक्रिया नहीं करता था ॥ १५५ ॥ उसका मुख कमलके समान था, नेत्र नील कमलके समान थे, · माल चन्द्रमाके. तुल्य थे और - प्रशान्तललितोदात्तधोरा इति चत्वारो नेपथ्यभेदाः । २. एकस्वरूपमिति यावत् । एकथा शब्दस्य भावः । ३. अमृतसम्बन्धिनेत्यर्थः । ४. सुखसन्तप्तः।५: त्रिसहस्रादिकं प्रिंशत् म०, ल.। ६. नर्गत: ब.. द., स.। ७.स्वावधिक्षेत्र मात्राम् । ८. सदृशौ । ९. बिम्बिकापक्यफलकाम्तिधरः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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