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________________ २२६ आदिपुराणम् ललितपदविहारैर्भूविकारैरुदारैर्नयन युगविलासैरङ्गलासैः सुहासैः । प्रकटितमृदुमानैः सानुभावैश्व' मात्रै : ' जगृहुरथ मनोऽस्याब्जोपमास्या वयस्याः ॥ २०६॥ शार्दूलविक्रीडितम् तासामिन्दुकलामले स्ववदनं पश्यन् कपोलाब्दके तदूवक्त्राम्बुजभृङ्गतां च घटयनाघ्रातवस्त्रानिलः । तन्नेत्रैश्च मनोजवाणसदृशैर्भूचापमुक्तैर्भृशं विद्धं स्वं हृदयं तदीयकरसंस्पर्शः समाश्वासयन् ॥ २०७ ॥ स्रग्धरा रेमे रामाननेन्दुद्युतिरुचिरतरे स्त्रे विमाने विमाने जैनों पूजां १०. भुआनो दिव्यभोगानमरपरिवृतो यान् सुरेभैः सुरेभैः । च तन्वन् मुहुरतनुरुचा भासमानोऽसमानो लक्ष्मीवानच्युतेन्द्रः सुचिरमुरुतर 'स्वांसकान्तः सकान्तः ॥ २०८ ॥ इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहे श्रीमदच्युतेन्द्रैश्वर्यवर्णनं नाम दशमं पर्व ॥१०॥ गाती हुई, राग-रागिनियों का प्रारम्भ कर रही हैं, और जो हरप्रकारसे समान हैं -सदृश हैं अथवा गर्वसे युक्त हैं ऐसी देवाङ्गनाएँ उस अच्युतेन्द्रको बड़ा आनन्द प्राप्त करा रही थीं ॥२०५॥ जिनके मुख कमलके समान सुन्दर हैं ऐसी देवाङ्गनाएँ, अपने मनोहर चरणोंके गमन, भौंहोंके विकार, सुन्दर दोनों नेत्रोंके कटाक्ष, अंगोपांगोंकी लचक, सुन्दर हास्य, स्पष्ट और कोमल हाव तथा रोमाञ्च आदि अनुभावोंसे सहित रति आदि अनेक भावोंके द्वारा उस अच्युतेन्द्रका मन ग्रहण करती रहती थीं || २०६ || जो अपनी विशाल कान्तिसे शोभायमान है, जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता, और जो अपने स्थूल कन्धोंसे शोभायमान है ऐसा वह समृद्धिशाली अच्युतेन्द्र, स्त्रियोंके मुखरूपी चन्द्रमासे अत्यन्त देदीप्यमान अपने विस्तृत बिमान में कभी देवांगनाओंके चन्द्रमा की कलाके समान निर्मल कपोलरूपी दर्पण में अपना मुख देखता हुआ, कभी उनके मुखकी श्वासको सँघकर उनके मुखरूपी कमलपर भ्रमर-जैसी शोभाको प्राप्त होता हुआ, कभी भौंहरूपी धनुषसे छोड़े हुए उनके नेत्रोंके कटाक्षोंसे घायल हुए अपने हृदयको उन्हीं कोमल हाथोंके स्पर्शसे धैर्य बँधाता हुआ, कभी दिव्य भोगोंका अनुभव करता हुआ, कभी अनेक देवोंसे परिवृत होकर हाथीके आकार विक्रिया किये हुए देवोंपर चढ़कर गमन करता हुआ और कभी बार-बार जिनेन्द्रदेव की पूजाका विस्तार करता हुआ अपनी देवाङ्गनाओंके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा ।।२०७ - २०८ || इस प्रकार श्रार्षनामसे प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रह में श्रीमान् अभ्युतेन्द्र के ऐश्वर्यका वर्णन करनेवाला दशवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥ १० ॥ १. बलः । २. मृदुत्वैः । ३. ससामर्थ्येः । ४. विकारै: । ५. वयस्विन्यः । ६. विगत्प्रमाणे । ७. गच्छन् । ८. देवगजैः । ९, शोभन शब्दैः । १०. पूजां वितन्वन् प० । ११. निजभुजाशिखरम । १२. स्वान्तकान्तः स०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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