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________________ २२२ आदिपुराणम् नृपस्तु सुविधिः पुत्रस्नेहान गार्हस्थ्यमत्यजन् । उत्कृष्टोपासकस्थान तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥१५॥ सदर्शनं व्रतोयोत समता प्रोषपनतम् । सचित्तसेवाविरति महामोसंगवर्जनम् ॥१५९॥ ब्रह्मचर्यमभारम्मपरिप्रहपरिच्युतिम् । तत्रानुमननस्वागं स्वोदिष्टपरिवर्जनम् ॥१६०॥ स्थानानि गृहिणां प्राहुरेकादशगणाधिपाः । स तेषु पश्चिमं स्थानमाससाद क्रमान्नृपः ॥१६॥ पञ्चेवाणुव्रतान्येषां विविधं च गुणवतम् । शिक्षाप्रतानि चत्वारि ब्रतान्याहुहाश्रमे । ॥१६२॥ स्थूलात् प्राणातिपाताच सुषावादाच चौर्यतः । परबीसेवनात्तृष्णाप्रकर्षाच निवृत्तयः ॥१६॥ व्रतान्येतानि पक्ष स्युविनासंस्कृतानि वै । सम्यक्त्वशुद्धियुक्तानि महोदाण्यगारिणाम् ॥१६॥ दिग्देशानर्थदण्डेभ्यो विरतिः स्याद्गुणवतम् । मोगोपमोगसंख्यानमप्यास्तद्गुणवतम् ॥१६५॥ समतां प्रोषधविधि तयैवातिथिसंग्रहम् । मरणान्ते च संन्यासं प्राहुः शिक्षानतान्यपि ॥१६६॥ द्वादशात्मकमेतद्धि प्रतं स्याद् गृहमेधिनाम् । स्वर्गसौषस्य सोपानं पिधानमपि दुर्गः ॥१६॥ ततो दर्शनसंपूतां व्रतशुदिमुपेयिवान् । उपासिष्ट स मोक्षस्य मार्ग राजर्षिरूर्जितम् ॥१६॥ अथावसाने नैर्ग्रन्थीं प्रव्रज्यामुपसेदिवान् । सुविधिविधिनाराध्य मुक्तिमार्गमनुत्तरम् ॥१६९॥ समाधिना तनुत्यागादच्युतेन्द्रऽभवद् विभुः। द्वाविंशत्यधिसंख्यात परमायुमहर्द्धिकः ॥१७॥ होनेको निर्वेद कहते हैं ॥१५७॥ राजा सुविधि केशव पुत्रके स्नेहसे गृहस्थ अवस्थाका परित्याग नहीं कर सका था, इसलिए श्रावकके उत्कृष्ट पदमें स्थित रहकर कठिन तप तपता था ।।१५८।। जिनेन्द्रदेवने गृहस्थोंके नीचे लिखे अनुसार ग्यारह स्थान या प्रतिमाएँ कही हैं (१) दर्शनप्रतिमा (२) व्रतप्रतिमा (३) सामायिकप्रतिमा (४) प्रोषधप्रतिमा (५) सचित्तत्यागप्रतिमा (६) दिवामैथुनत्यागप्रतिमा (७) ब्रह्मचर्यप्रतिमा (८) आरम्भत्यागप्रतिमा (९) परिग्रहत्यागप्रतिमा (१०) अनुमतित्यागप्रतिमा और (११) उद्दिष्टत्यागप्रतिमा। इनमें से सुविधि राजाने क्रम-क्रमसे ग्यारहवाँ स्थान-उद्दिष्टत्यागप्रतिमा धारण की थी॥१५९-१६१॥ जिनेन्द्रदेवने गृहस्थाश्रमके उक्त ग्यारह स्थानोंमें पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इन बारह व्रतोंका निरूपण किया है ॥ १६२ ॥ स्थूल हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहसे निवृत्त होनेको क्रमसे अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह परिमाणाणुव्रत कहते हैं ॥ १६३ ॥ यदि इन पाँच अणुव्रतोंको हरएक व्रतकी पाँच-पाँच भावनाओंसे सुसंस्कृत और सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिसे युक्त कर धारण किया जाये तो उनसे गृहस्थोंको बड़े-बड़े फलोंको प्राप्ति हो सकती है ।।१६४॥ दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदण्डविरति ये तीन गुणव्रत हैं । कोई-कोई आचार्य भोगोपभोगसे परिमाणव्रतको भी गुणव्रत कहते हैं [ और देशवतको शिक्षाप्रतोंमें शामिल करते हैं ] ॥१६५।। सामायिक, प्रोषधोपवास, अतिथिसंविभाग और मरण समयमें संन्यास धारण करना ये चार शिक्षाव्रत कहलाते हैं। [अनेक आचार्योंने देशव्रतको शिक्षाव्रतमें शामिल किया है और संन्यासका बारह व्रतोंसे भिन्न वर्णन किया है ] ॥१६६।। गृहस्थोंके ये उपर्युक्त बारह व्रत स्वर्गरूपी राजमहलपर चढ़नेके लिए सीढ़ीके समान हैं और नरकादि दुर्गतियोंका आवरण करनेवाले हैं ॥१६७। इस प्रकार सम्यगदर्शनसे पवित्र व्रतोंकी शुद्धताको प्राप्त हुए राजर्षि सुविधि चिरकाल तक श्रेष्ठ मोक्षमार्गकी उपासना करते रहे ॥ १६८ ॥ अनन्तर जीवनके अन्त समयमें परिग्रहरहित दिगम्बर दीक्षाको प्राप्त हुए सुविधि महाराजने विधिपूर्वक उत्कृष्ट मोक्षमार्गकी आराधना कर समाधि-मरणपूर्वक शरीर छोड़ा जिससे अच्युत स्वर्गमें इन्द्र हुए ॥१६९॥ वहाँ उनकी आयु बीस सागर प्रमाण थी १. सामायिकम् । २.-मह्नि स्त्री-अ०, ८०, स०, म । -महि स्त्रीसंगजितम् प०, । ३. जिना. विपः मल०। ४. महोत्तरफलानि । ५. भोगोपभोगपरिमाणम् । ६. सामायिकम् । ७. भाराधयति स्म । ८.-विधिमाराध्य प० । ९.-संख्यान-अ०, स०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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