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________________ दशमं पर्व २२१ बज्रजामवे पासौ श्रीमती तस्य बलमा । 'सेवस्य पुत्रता याला संमृतिस्थितिरीशी ॥१४६॥ तस्मिन् पुत्रे नृपस्पास्य प्रोतिरासीद् गरीयसी । पुत्रमानं च संप्रीत्यै किमुताशनाचरः ॥१४७॥ शार्दूलार्यचराचाच देशेऽत्रैव नृपात्मजाः । जाताः समानपुण्यस्वादन्योऽम्ममहशयः ॥११८॥ विभीषणभूपात् पुत्रः मिययतोवरजनि । देवश्चित्राङ्गद श्च्युस्वा वरदत्ताहयो दिवः ॥१९॥ मणिपानम्तमस्वीः सूनुरजायत । मणिकुण्डलनामासौं वरसेनसमायः ॥१५॥ रतिषणमहीभ चन्द्रमस्या सुखोऽननि । मनोहरो विवश्व्युत्वा चित्राङ्गदसमाख्यया ॥१५१॥ प्रमअननृपाचित्रमालिन्यां स ममोरथः । प्रशान्तमदनः सूनुरजनिष्ट दिवइच्युतः ॥१५२॥ ते सर्व सदशाकाररूपलावण्यसंपदः। स्वोचितां श्रियमासाद्य चिरं भोगानभुञ्जत ॥१५३॥ ततोऽमी चक्रिणान्येद्यरभिवन्ध समं जिनम् । भक्त्या विमलवाहाल्यं महाप्रामाण्यमाश्रिताः ॥१५४॥ तृपैरष्टादशाभ्यस्त सहनप्रमितैरमा । सहस्रः पञ्चभिः पुत्रैः प्रामाजीचक्रवर्त्यसौ ॥१५॥ परं संवेगनिवेदपरिणाममुपागतः । ते तेपिरे तपस्तीवं मार्गः स्वर्गापवर्गयोः ।।१५६॥ संवेगः परमा नीति में धर्मफलेषु च । निवेदो देहभोगेषु संसारे च विरकता ॥१५॥ का जीव ) स्वर्गसे च्युत होकर उन दोनोंके केशव नामका पुत्र हुआ ।। १४५ ॥ वनजंघ पर्यायमें जो इसकी श्रीमती नामकी प्यारी सी थी वही इस भवमें इसका पुत्र हुई है। क्या कहा जाये ? संसारकी स्थिति ही ऐसी है ।। १४६ ।। उस पुत्रपर सुविधि राजाका भारी प्रेम थी सो ठीक ही है। जब कि पुत्र मात्र ही प्रीतिके लिए होता है तब यदि पूर्वभवका प्रेमपात्र श्रीका जीव ही आकर पुत्र उत्पन्न हुआ हो तो फिर कहना ही क्या है ? उसपर तो सबसे अधिक प्रेम होता ही है ।।१४७ा सिंहनकुल, वानर और शूकरके जीव जो कि भोगभूमिके बाद द्वितीय स्वर्गमें देव हुए थे वे भी वहाँसे चय कर इसी वत्सकावती देशमें सुविधिके समान पुण्याधिकारी होनेसे उसीके समान विभूतिके धारक राजपुत्र हुए ॥ १४८॥ सिंहका जीवचित्रांगद देष स्वर्गसेच्यत होकर विभीषण राजासे उसकी प्रियदत्ता नामकी पत्नीके उदर में बरदत्त नामका पुत्र हुआ ॥१४९|| शूकरका जीव-मणिकुण्डल नामका देव नन्दिषेण राजा और अनन्तमती रानीके वरसेन नामका पुत्र हुआ ॥१५०।। वानरका जीव-मनोहर नामका देव स्वर्गसे च्युत होकर रतिषेण राजाकी चन्द्रमती रानीके चित्रांगद नामका पुत्र हुआ॥१५१॥ और नकुलका जीव-मनोरथ नामका देव स्वर्गसे च्युत होकर प्रभंजन राजाकी चित्रमालिनी रानीके प्रशान्तमदन नामका पुत्र हुआ ॥१५२।। समान आकार, समान रूप, समान सौन्दर्य और समान सम्पत्तिके धारण करनेवाले वे सभी राजपुत्र अपने-अपने योग्य राज्यलक्ष्मी पाकर चिरकाल तक भोगांका अनुभव करते रहे ।। १५३ ॥ तदनन्तर किसी दिन वे चारों हीराजा, चक्रवर्ती अभयघोषके साथ विमलवाह जिनेन्द्र देवकी वन्दना करने के लिए गये । वहाँ सबने भक्तिपूर्वक वन्दना की और फिर सभीने विरक्त - होकर दीक्षा धारण कर ली ॥१५४।। वह चक्रवर्ती अठारह हजार राजाओं और पाँच हजार पुत्रोंके साथ दीक्षित हुआ था ।। १५५ ॥ वे सब मुनीश्वर उत्कृष्ट संवेग और निवेदरूप परिणामोंको प्राप्त होकर स्वर्ग और मोक्षके मार्गभूत कठिन तप तपने लगे ॥१५६॥ धर्म और धर्मके फलोंमें उत्कट प्रीति करना संवेग कहलाता है और शरीर, भोग तथा संसारसे विरक्त १. सवाद्य प०, द०, स०, अ०। २. किमु तेष्वङ्गना- ल.। ३. व्याघ्रवरः । ४. वराहचरः। ५. रविषेण-अ०, ५०, स०। ६. मकंटचरः। ७. अभ्यस्तं गुणितम् । ८-रमी १०. ल.। ९. मार्ग द०, स०, म०, ल०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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