SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 308
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २१८ आदिपुराणम् विषये मङ्गलावस्यां नगर्या रत्नराम्चये । महीधरस्य सम्राजः सुन्दर्याश्च सुतोऽभवत् ।।११५॥ जयसेनश्रुतिर्बुद्ध्वा विवाहसमये सुरात् । श्रीधराख्गात् प्रवव्राज गुरुं यमधरं श्रितः ॥१६॥ नारकी वेदना घोरा तेनासौ किल बोधितः । निर्विद्य विषयासंगात् तपो दुश्वरमाचरत् ॥११॥ ततो ब्रह्मेन्द्रतां सोऽगात् जीवितान्ते समाहितः । क नारकः क देवोऽयं विचित्रा कर्मणां गतिः ॥११॥ नीचैत्तिरधर्मेण धर्मणोच्चैः स्थितिं भजेत् । तस्मादुच्चः पदं वान्छन् नरो धर्मपरो भवेत् ॥११॥ ब्रह्मलोकादथागत्य ब्रह्मेन्द्रः सोऽवधीक्षणः । श्रीधरं पूजयामास गतं कल्याणमित्रताम् ॥१२०॥ श्रीधरोऽथ दिवश्च्युस्वा जम्बूद्वीपमुपाश्रिते । प्राग्विदेहे महावत्सविषये स्वर्गसमिभे ११॥ सुसीमानगरे जज्ञे सुरष्टिनृपतेः सुतः । मातुः सुन्दरनन्दायाः सुविधिर्नाम पुण्यधीः ॥१२२॥ बाल्यात् प्रभृति सर्वासा कलानां सोऽभवनिधिः । शशीव जगतस्तन्वमन्वहं नयनोत्सवम् ॥१२३॥ स बाल्य एव सद्धर्ममबुद्ध प्रतिबुद्धधीः । प्रायेणात्मवता चित्तमात्मश्रेयसि रज्यते ॥१२४॥ शैशवेऽपि स संप्रापज्जनतानन्ददायिनी। रूपसंपदमापूर्णयौवनस्तु विशेषतः ॥१२५॥ मकुटालकृतप्रांशु मूर्दा प्रोन्नतिमादधे । मेरुः कुलमहीध्राणामिव मध्ये स भूभृताम् ॥१२६॥ भयंकर नरकसे निकलकर पूर्व पुष्कर द्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें मंगलावती देशके रत्नसंचयनगरमें महीधर चक्रवर्तीके सुन्दरी नामक रानीसे जयसेन नामका पुत्र हुआ। जिस समय उसका विवाह हो रहा था उसी समय श्रीधरदेवने आकर उसे समझाया जिससे विरक्त होकर उसने यमधर मुनिराजके समीप दीक्षा धारण कर ली। श्रीधरदेवने उसे नरकोंके भयंकर दुःखकी याद दिलायी जिससे वह विषयोंसे विरक्त होकर कठिन तपश्चरण करने लगा॥११४-११७। तदनन्तर आयुके अन्त समयमें समाधिपूर्वक प्राण छोड़कर ब्रह्मस्वर्गमें इन्द्र पदको प्राप्त हुआ। देखो, कहाँ तो नारकी होना और कहाँ इन्द्र पद प्राप्त होना। वास्तवमें कर्मोकी गति बड़ी ही विचित्र है ॥११८॥ यह जीव हिंसा आदि अधर्मकार्योंसे नरकादि नीच गतियोंमें उत्पन्न होता है और अहिंसा आदि धर्मकार्योंसे स्वर्ग आदि उच्च गतियोंको प्राप्त हो है इसलिए उच्च पदकी इच्छा करनेवाले पुरुषको सदा धर्ममें तत्पर रहना चाहिए ॥११९॥ अनन्तर अवधिज्ञानरूपी नेवसे युक्त उस ब्रह्मन्द्रने (शतबुद्धि या जयसेनके जीवने ) ब्रह्म स्वर्गसे आकर अपने कल्याणकारी मित्र श्रीधरदेवकी पूजा की ॥१२०॥ अनन्तर वह श्रीधरदेव स्वर्गसे च्युत होकर जम्बूद्वीपसम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्र में स्वर्गके समान शोभायमान होनेवाले महावत्स देशके सुसीमानगरमें सुदृष्टि राजाकी सुन्दरनन्दा नामकी रानीसे पवित्रबुद्धिका धारक सुविधि नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१२१-१२२॥ वह सुविधि बाल्यावस्थासे ही चन्द्रमाके समान समस्त कलाओंका भाण्डार था और प्रतिदिन लोगोंके नेत्रोंका आनन्द बढ़ाता रहता था ॥१२३॥ उस बुद्धिमान सुविधिने बाल्य अवस्थामें ही समीचीन धर्मका स्वरूप समझ लिया था। सो ठीक ही ह, आत्मज्ञानी पुरुषोंका चित्त आत्मकल्याणमें ही अनुरक्त रहता है ।।१२४॥ वह बाल्य अवस्थामें हो लोगोंको आनन्द देनेवाली रूपसम्पदाको प्राप्त था और पूर्ण युवा होनेपर विशेष रूपसे मनोहर सम्पदाको प्राप्त हो गया था ॥१२५।। उस सुविधिका ऊँचा मस्तक सदा मुकुटसे अलंकृत रहता था इसलिए अन्य राजाओंके बीच में वह सुविधि उस प्रकार उच्चता धारण करता था जिस प्रकार कि कुलाचलोंके ... १. समाधानयुक्तः । २. सीतानद्युत्तरतटवर्तिनि । ३. यौवने । ४. बुद्धिमताम् । ५. मुकुटा-अ०, प० । ६. उन्नतः । ७. मूर्ना द०, म०, स०, ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy