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________________ देशमं पर्व २०९ धर्मेणास्मा व्रजत्यूर्ध्वमधर्मेण पतत्यधः । मिश्रस्तु याति मानुष्यमित्याप्तोति' विनिश्चिनु ॥११॥ स एष शतबुद्धिस्ते मिथ्याज्ञानस्य दार्चतः । द्वितीयनरके दुःखमनुभुक्तऽतिदारुणम् ॥१२॥ सोऽयं स्वयंकृतोऽनर्थो जन्तोरप्रजितात्मनः । यदयं विद्विषन् धर्ममधर्मे कुरुते रतिम् ॥१३॥ धर्मात् सुखमधर्माच दुःखमित्यविगानतः । धर्मकपरतां धत्ते बुधोलजिहासयों ॥१४॥ धर्मः प्राणिया सत्यं क्षान्तिः शोचं वितृष्णता। ज्ञानवैराग्यसंपत्तिरधर्मस्तद्विपर्ययः ॥१५॥ तनोति विषयासंगः सुखसंतर्षमणिनः । स तीव्रमनुसंधत्ते तापं दीप्त इवानलः ॥१६॥ संतप्तस्तत्प्रतीकारमोप्सन् पापेऽनुरज्यते । द्वेष्टि पापरतो धर्ममधर्माच पतत्यधः ॥१७॥ विपच्यते यथाकालं नरके दुरनुष्ठितम् । भनेहसि समभ्यणे यथाऽलर्कशुनो विषम् ॥१८॥ यथोपचरितैर्जन्तुं तीव्र ज्वरपति स्वरः । तथा दुरीहितैः पाप्मा गाढीभवति दुर्दशः ॥१९॥ दुरन्तः कर्मणां पाको ददोति कटुकं फलम् । येनारमा पतितः श्वभ्रे क्षणं दुःखान्न मुच्यते ॥२०॥ कीदृशं नरके दुःखं तनोत्पत्तिः कुतोऽङ्गिनाम् । इति चेच्छृणु तत्सम्यक् प्रणिधाय मनः क्षणम् ॥२१॥ हिंसायां निरता ये स्युबै मृषावादतत्पराः । खुराशीलाः परस्त्रीषु ये रता मद्यपाश्च ये ॥२२॥ निमग्न होते हैं इसलिए विद्वान पुरुषोंको आप्त प्रणीत सम्यग्ज्ञानका ही निरन्तर अभ्यास करना चाहिए ।।१०।। यह आत्मा धर्मके प्रभावसे स्वर्ग-मोक्ष रूप उच्च स्थानोंको प्राप्त होता है। अधर्मके प्रभावसे अधोगति अर्थात् नरकको प्राप्त होता है। और धर्म, अधर्म दोनोंके संयोगसे मनुष्यपर्यायको प्राप्त होता है। हे भद्र, तू उपर्युक्त अर्हन्तदेवके वचनोंका निश्चय कर ॥११॥ वह तुम्हारा शतबुद्धि मंत्री मिथ्याज्ञानकी दृढ़तासे दूसरे नरकमें अत्यन्त भयंकर दुःख भोग रहा. है ।।१२।। पापसे पराजित आत्माको स्वयं किये हुए अनर्थका यह फल है जो उसका धर्मसे द्वेष और अधर्मसे प्रेम होता है ॥१३॥ 'धर्मसे सुख प्राप्त होता है और अधर्मसे दुःख मिलता है यह बात निर्विवाद प्रसिद्ध है इसीलिए तो बुद्धिमान पुरुष अनर्थोंको छोड़नेकी इच्छासे धर्ममें ही तत्परता धारण करते हैं ।।१४।। प्राणियोंपर दया करना, सच बोलना, क्षमा धारण करना, लोभका त्याग करना, तृष्णाका अभाव करना, सम्यग्ज्ञान और वैराग्यरूपी संपत्तिका इकट्ठा करना ही धर्म है और उससे उलटे अदया आदि भाव अधर्म है ।।१५।। विषयासक्ति जीवोंके इन्द्रियजन्य सुखकी तृष्णाको बढ़ाती है, इन्द्रियजन्य सुखकी तृष्णा प्रज्वलित अग्निके समान भारी सन्ताप पैदा करती है । तृष्णासे सन्तप्त हुआ प्राणी उसे दूर करनेको इच्छासे पापमें अनुरक्त हो जाता है, पापमें अनुराग करनेवाला प्राणी धर्मसे द्वेष करने लगता है और धर्मसे द्वेष करनेवाला जीव अधर्मके कारण अधोगतिको प्राप्त होता है ।।१६-१७॥ जिस प्रकार समय आनेपर (प्रायः वर्षाकालमें) पागल कुत्तका विष अपना असर दिखलाने लगता है उसी प्रकार किये हुए पापकर्म भी समय पाकर नरकमें भारी दुःख देने लगते हैं।।१८।। जिस प्रकार अपथ्य सेवनसे मूर्ख मनुष्योंका ज्वर बढ़ जाता है उसी प्रकार पापाचरणसे मिध्यादृष्टि जीवोंका पाप भी बहुत बड़ा हो जाता है।।१९।। किये हुए कर्मोंका परिपाक बहुत ही बुरा होता है । वह सदा कडुए फल देता रहता है; उसीसे यह जीव नरकमें पड़कर वहाँ क्षण-भरके लिए भी दुःखसे नहीं छूटता ॥२०॥ नरकोंमें कैसा दुःख है ? और वहाँ जीवोंकी उत्पत्ति किस कारणसे होती है ? यदि तू यह जानना चाहता है तो क्षण-भरके लिए मन स्थिर कर सुन ।।२१।। जो जीव हिंसा करनेमें आसक्त रहते हैं, झूठ बोलनेमें तत्पर होते हैं, चोरी १. -मित्याप्तोक्तविनिश्चितम् अ०,स० । २. रविजितान्मनः ८०,स०,१०,ल० । ३. अविप्रतिपत्तितः । ४. हातमिच्छया। ५. ज्ञानं वै- स०। ६. विषयासक्तिः । ७. अभिलाषम् । ८. दुराचारः। ९.काले। १०. उन्मत्तशुनकस्य । ११. अपथ्यभोजनः । २७
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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