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________________ २०४ आदिपुराणम् साधवो मुन्छिमार्गस्य साधनेऽपितधोधनाः । 'लोकानुवृत्तिसाध्यांशो नैषां कश्चन पुष्करः ॥१२॥ परानुग्रहादया तु केवलं मार्गदेशनाम् । कुर्वतेऽमी प्रगत्यापि निसर्गोऽयं महात्मनाम् ॥१३॥ स्वदुःसे निजारम्माः परदुःखेनु दुःखिताः । मिर्गापेवं परायेंषु बद्धकक्ष्या मुमुक्षवः ।।१६॥ क्व वयं निस्पृहाः क्वेमे क्वेयं ममिः सुखोचिता । तथाप्यनुग्रहेस्माकं सावधानास्तपोधनाः ॥१५॥ भवन्तु सुखिनः सवें सत्वा इत्येव केवलम् । यतो यतन्ते तेषां यतित्वं सचिरुज्यते ॥१६॥ एवं नाम महीयांसः परायें कुर्वते रतिम् । दूरादपि समागत्य ययैतौ चारणाबुमौ ॥१६॥ प्रचापि चारणौ साक्षात् पझ्यामीव पुरःस्थिती । तपस्वननपानापतनकृततन मुनी ॥३६४॥ ---- चारणौ चरणहून्दे प्रणतं सूदुपाणिना। शन्तौ स्नेहनिम्नं मां पधावामधिमस्तकम् ॥१६९॥ अपिप्यतां च मां धर्मवृषितं दर्शनासतम् । अपास्य मोगसंतापं नितं येन मे मनः ॥ सत्यं प्रीतिकरो ज्यायान् मुनियोऽस्मास्वदर्शयत् । प्रोति सर्वत्र गप्रीतिः सन्मार्गप्रतिबोधनात् ॥१७॥ बढ़ाता है॥१६शायेसाधु पुरुष मोक्षमार्गको सिद्ध करने में सदा दत्तचित्त रहते हैं। इन्हें सांसारिक लोगोंको प्रसन्न करनेका कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता ॥१६२।। ये मुनिजन केवल परोपकार करनेकी बुद्धिसे ही उनके पास जा-जाकर मोक्षमार्गका उपदेश दिया करते हैं। वास्तवमें यह महापुरुषोंका स्वभाव ही है ॥१६॥ मोक्षकी इच्छा करनेवाले ये साधुजन अपने दुःख दूर करनेके लिए सदा निर्दय रहते हैं अर्थात् अपने दुःख दूर करनेके लिए किसी प्रकारका कोई आरम्भ नहीं करते। परके दुःखोंमें सदा दुःखी रहते हैं अर्थात उनके दुःख दूर करनेके लिए सदा तत्पर रहते हैं। और दूसरोंके कार्य सिद्ध करनेके लिए नि:स्वार्थ भावसे सदा तैयार रहते हैं ॥१६४॥ कहाँ हम और कहाँ ये अत्यन्त निस्पृह साधु ? और कहाँ यह मात्र सुखोंकास्थान भोगभूमि अर्थात् निःस्पृह मुनियोंका भोगभूमिमें जाकर वहाँ के मनुष्योंको उपदेश देना सहज कार्य नहीं है तथापि ये तपस्वी हुम लोगोंके उपकारमें कैसे सावधान हैं ? ॥१६५।। ये साधुजन सदा यही प्रयत्न किया करते हैं कि संसारके समस्त जीव सदा सुखी रहें और इसीलिए वे यति (यतते इति यतिः) कहलाते हैं ।। १६६ ॥ जिस प्रकार इन चारण ऋद्धिधारी पुरुषोंने दूरसे आकर हम लोगोंका उपकार किया उसी.प्रकार महापुरुष दूसरोंका उपकार करने में सदा प्रीति रखते हैं ॥१६७। तपरूपी अग्निके सन्तापसे जिनका शरीर अत्यन्त कुश हो गया है ऐसे उन चारण मुनियोंको मैं अब भी साक्षात् देख रहा हूँ, मानो वे अब भी मेरे सामने ही खड़े हैं ॥१६८।। मैं उनके चरण-कमलों में प्रणाम कर रहा हूँ और वे दोनों चारणमुनि कोमल हायसे मस्तकपर स्पर्श करते हुए मुझे स्नेहके वशीभूत कर रहे हैं। १६९ ॥ मुस, धर्मके प्यासे मानवको उन्होंने सम्यग्दर्शनरूपी अमृत पिलाया है, इसीलिए मेरा मन भोगजन्य सन्तापको छोड़कर अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है ॥१७०।। वे प्रीर्तिकर नामके ज्येष्ठ मुनि सचमुच में प्रीतिंकर हैं क्योंकि उनकी प्रीति सर्वत्र. गामी है और मार्गका उपदेश देकर उन्होंने. हम लोगोंपर अपार प्रेम दरशाया है। भावार्थजो मनुष्य सब जगह जानेकी सामर्थ्य होनेपर भी किसी खास जगह किसी खास व्यक्तिके पास जाकर उसे उपदेश आदि देवे तो उससे उसकी अपार प्रीतिका पता चलता है। यहॉपर भी उन मुनियों में चारण ऋद्धि होनेसे सब जगह जानेकी सामर्थ्य थी परन्तु उस समय अन्य जगह न जाकर वे वनजंघके जीवके पास पहुँचे इससे उसके विषय में उनकी अपार प्रीतिका पता १. जनानुवर्तनम् । २. श्रेष्ठः । ३.-दर्शनम् अ०, स०। -देशनम् म०, ल०। ४. पुनरुत्पथ.। ५. वाञ्छा । ६. चारणर्षभो अ०, स० । ७. तापोऽग्निः । ८. पानमकारयताम् । ९. भोगसन्तर्षम् प०, अ०, ६०, स०, म० । १०. सर्वत्रगः प्रोतः म०, ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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