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________________ अष्टमं पर्व तदाश्वर्यं महद् दृष्ट्वा नृपस्यास्य चमूपतिः । मन्त्री पुरोहितश्च द्रागुपशान्ति परां गताः ॥२११॥ नृपदानानुमोदेन कुरुष्वार्थास्ततोऽभवन् । कालान्ते ते ततो गत्वा श्रीमदेशानकरूपजाः ॥ २१२ ॥ सुरा जाता विमानेशा मन्त्री काञ्चनसंज्ञके । विमाने कनकामोऽभूत् रुषितास्ये पुरोहितः ॥२१३॥ 'प्रमअनोऽभूत् सेनानीः प्रभानाम्नि प्रभाकरः । ललिताङ्गमवे युष्मत्परिवारामरा इमे ॥ २१४॥ ततः प्रच्युत्य शार्दूलचरो देवोऽभवत् स ते । मन्त्री मतिवरः सूनुः श्रीमत्यां मतिसागरात् ॥ २१५ ॥ अपराजित सेनान्यः * 'च्युतः स्वर्गात् प्रभाकरः । आर्जवायाश्च पुत्रोऽभूदकम्पनसमाह्वयः ॥ २१६ ॥ श्रुतकीर्ते रथानन्तमत्याश्च कनकप्रभः । सुतोऽभूदयमानन्दः पुरोधास्तव संमतः ॥ २१७॥ प्रमञ्जनश्च्युतस्तस्मात् श्रेष्ठ्यभूद् धनमित्रकः । धनदत्तोदरे जातो धनदसाद् धनर्द्धिमान् ॥२१८॥ इति तस्य मुनीन्द्रस्य वचः श्रुत्वा नराधिपः । श्रीमती च तदा धर्मे परं संवेगमापतुः ॥ २१९ ॥ राजा सविस्मयं भूयोऽप्यपृच्छत् तं मुनीश्वरम् । अमी नकुलशार्दूलगोलाङ्गलाः ससूकराः ॥ २२० ॥ कस्मादस्मिञ्जनाकीर्ण देशे तिष्ठन्स्यमाकुलाः । भवम्मुखारविन्दावलोकने दसदृष्टयः ॥२२१॥ इति राज्ञानुयुक्तोऽसौ चारणर्षिरवोचत । शार्दूलोऽयं भवेऽन्यस्मिन् देशेऽस्मिन्नेव विश्रुते ॥ २२२ ॥ हास्तिनायपुरे ख्याते वैश्यात् सागरदन्ततः । धनवस्यामभूत् सूनुरुप्रसेनसमाह्वयः ॥ २२३ ॥ सोऽप्रत्याख्यानतः क्रोधात् पृथिवीभेदसन्निभात् । तिर्यगायुर्वबन्धाऽज्ञो निसर्गादतिरोषणः ॥ २२४॥ १८५ स्वर्गके दिवाकरप्रभ नामक विमानमें दिवाकरप्रभ नामका देव हुआ || २१०|| इस आश्चर्यको देखकर राजा प्रीतिवर्धन के सेनापति, मन्त्री और पुरोहित भी शीघ्र ही अतिशय शान्त हो गये ।२११|| इन सभीने राजाके द्वारा दिये हुए पात्रदानकी अनुमोदना की थी इसलिए आयु समाप्त होनेपर वे उत्तरकुरु भोगभूमिमें आर्य हुए ॥ २१२|| और आयुके अन्तमें ऐशान स्वर्ग में लक्ष्मीमान् देव हुए। उनमें से मन्त्री, कांचन नामक विमानमें कनकाभ नामका देव हुआ, पुरोहित रुचि नामके विमानमें प्रभंजन नामका देव हुआ और सेनापति प्रभानामक विमान में प्रभाकर नामका देव हुआ। आपकी ललितांगदेवकी पर्यायमें ये सब आपके ही परिवारके देव थे ।।२१३-२१४।। सिंहका जीव वहाँ से च्युत हो मतिसागर और श्रीमतीका पुत्र होकर आपका मतिवर नामका मन्त्री हुआ है ।। २१५|| प्रभाकरका जीव स्वर्गसे च्युत होकर अपराजित सेनानी और आर्जवाका पुत्र होकर आपका अकम्पन नामका सेनापति हुआ है ॥ २१६ ॥ कनकप्रभका जीव श्रुतकीर्ति और अनन्तमतीका पुत्र होकर आपका आनन्द नामका प्रिय पुरोहित हुआ है ॥२१॥ तथा प्रभंजन देव वहाँसे च्युत होकर धनदत्त और धनदत्ताका पुत्र होकर आपका धनमित्र नामका सम्पत्तिशाली सेठ हुआ है ॥२१८॥ | इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर राजा वजजंघ और श्रोमती - दोनों ही धर्मके विषयमें अतिशय प्रीतिको प्राप्त हुए || २१९ || राजा वज्रघने फिर भी बड़े आश्चर्यके साथ उन मुनिराजसे पूछा कि ये नकुल, सिंह, बानर और शूकर चारों जीव आपके मुख-कमलको देखनेमें दृष्टि लगाये हुए इन मनुष्योंसे भरे हुए स्थान में भी निर्भय होकर क्यों बैठे हैं ? ॥ २२० -२२१|| इस प्रकार राजाके पूछनेपर चारण ऋद्धिके धारक ऋषिराज बोले, हे राजन्, यह सिंह पूर्वभवमें इसी देशके प्रसिद्ध हस्तिनापुर नामक नगर में सागरदत्त वैश्यसे उसकी धनवती नामक खीमें उग्रसेन नामका पुत्र हुआ था ।। २२२ - २२३ ।। वह उग्रसेन स्वभावसे ही अत्यन्त क्रोधी था इसलिए उस अज्ञानीने पृथिवीभेदके समान अप्रत्याख्यानावरण १. रुचिताख्ये अ०, स० द० । २. प्रभञ्जने विमाने च नाम्नि तस्य प्रभाकरः म० । ३. प्रभाविमाने प्रभाकरो देवः । ४. सेनापतेः । ५. धर्मे धर्मपदे चानुरागः संवेगस्तम् । ६. मकराः अ०, प० । ७. परिपुष्टः । २४
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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