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________________ - अष्टमं पर्व १८१ निपत्य' भुवि भूयोऽपि प्रोत्थाय कृतवलानाः । रेजिरे वाजिनः स्नेहै: पुष्टा मला इवोद्धताः ॥१६२॥ 'मधुपानादिव क्रुद्धा बद्धाः शाखिषु दन्तिनः । सुवंशा जगतां पूज्या बलादाधोरणैस्तदा ॥१३॥ यथास्वं सन्निविष्टेषु सैन्येषु स ततो नृपः । शिविरं प्रापदध्वन्य हयैरविदितान्तरम् ॥१६॥ तुरङ्गमखुरोद्धृतरेणुरूषित मूर्तयः । स्विद्यन्तः सादिनः प्राप्तास्ते ललाटन्तपे रवौ ॥१६५॥ "कायमाने महामाने राजा तत्रावसत् सुखम् । सरोजलतरङ्गोस्थमृदुमारुतशीतले ॥१६॥ ततो दमधरामिख्यः श्रीमानम्बरचारणः । समं सागरसेनेन तधिवेशमुपाययौ ॥१६॥ कान्तारचर्या संगीर्य' पर्यटन्तौ यहच्छया । वज्रजामहीम रावासं तावुपेयशुः ॥१६८॥ दूरादेव मुनीन्द्रौ तौ राजापश्यन्महायुती । स्वर्गापवर्गयोर्मार्गाविव प्रक्षीणकल्मषौ ॥१६९॥ स्वादीतिविनिर्धवतमसौ तौ ततो मुनी । ससंभ्रमं समुत्थाय प्रतिजग्राह भूमिपः ॥१०॥ कृताञ्जलिपुटो मक्स्या दत्तार्थ्यः प्रणिपस्य तौ । गृहं प्रवेशयामास श्रीमत्या सह पुण्यमाक् ॥१७॥ प्रक्षालितानी संपूज्य मान्ये स्थाने निवेश्य तौ। प्रणिपत्य मनःकायवचोमिः शुदिमुद्वहन् ॥१७२॥ लिए उत्तम भवन ही बना दिये हों ॥१६१॥ जमीनमें लोटनेके बाद बड़े होकर हींसते हुए घोड़े ऐसे मालूम होते थे मानो तेल लगाकर पुष्ट हुए उद्धत मल्ल ही हों ॥१६२॥ पीठकी उत्तम रीढ़वाले हाथी भी भ्रमरोंके द्वारा मदपान करनेके कारण कुपित होनेपर ही मानो महावतोंद्वारा बाँध दिये गये थे जैसे कि जगत्पूज्य और कुलीन भी पुरुष मद्यपानके कारण बाँधे जाते हैं ॥१६३॥ तदनन्तर जब समस्त सेना अपने-अपने स्थानपर ठहर गयी तब राजा वज्रजंघ मार्ग तय करनेमें चतुर-शीघ्रगामी घोड़ेपर बैठकर शीघ्र ही अपने डेरेमें जा पहुँचे ॥१६४॥ घोड़ोंके खुरोंसे उठी हुई धूलिसे जिसके शरीर रूक्ष हो रहे हैं ऐसे घुड़सवार लोग पसीनेसे युक्त होकर उस समय डेरोंमें पहुँचे थे जिस समय कि सूर्य उनके ललाटको तपा रहा था ॥१६५।। जहाँ सरोवरके जलकी तरंगोंसे उठती हुई मन्द वायुके द्वारा भारी शीतलता विद्यमान थी ऐसे तालाबके किनारेपर बहुत ऊँचे तम्बूमें राजा वनजंघने सुखपूर्वक निवास किया ॥१६६।। . तदनन्तर आकाशमें गमन करनेवाले श्रीमान् दमधर नामक मुनिराज, सागरसेन नामक मुनिराजके साथ-साथ वनजंघके पड़ाव में पधारे ॥१६७। उन दोनों मुनियोंने वनमें ही आहार लेनेकी प्रतिज्ञा की थी इसलिए इच्छानुसार विहार करते हुए वनजंघके डेरेके समीप ये ॥१६८। वे मनिराज अतिशय कान्तिके धारक थे, और पापकोसे रहित थे इसलिए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्वर्ग और मोक्षके साक्षात् मार्ग ही हों ऐसे दोनों मुनियोंको राजा वनजंघने दूरसे ही देखा ॥१६९।। जिन्होंने अपने शरीरकी दीप्तिसे वनका अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे दोनों मुनियोंको राजा वनजंघने संभ्रमके साथ उठकर पड़गाहन किया ॥१७०।। पुण्यात्मा वनजंघने रानी श्रीमतीके साथ बड़ी भक्तिसे उन दोनों मुनियोंको हाथ जोड़ अर्घ दिया और फिर नमस्कार कर भोजनशालामें प्रवेश कराया ॥१७१।। वहाँ वनजंघने उन्हें ऊँचे स्थानपर बैठाया, उनके चरणकमलोंका प्रक्षालन किया, पूजा की, नमस्कार किया, अपने मन, १. पतित्वा। २. प्रोच्छाय कृतबलाशनाः १०, स०। ३. तैलैः । ४. मधुनो मद्यस्य पानात् । पक्ष मद्यपरक्षणात् । ५. क्रुद्धबद्धाः म०, द०, स०। ६. हस्तिपकः । ७. पथिकः । ८. आच्छादितः। ९. अश्वारोहाः । १०. पटकुट्याम् । ११. प्रतिज्ञां कृत्वा ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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