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________________ १७९ अष्टमं पर्व तुरङ्गमखुरोद्भूताः प्रासर्पन रेणवः पुरः । मार्गमस्येव निर्देष्टुं नभोमागविलकिनः ॥१४०॥ करिणां मदधाराभिः शीकरैश्च करोसितैः । हयलालाजलेश्चापि प्रणनाश महीरजः ॥१४॥ ततः पुराद् विनिर्यान्ती सा चमूळरुचद् भृशम् । महानदीव सच्छाफेना वाजितरङ्गिका ॥१४२॥ करीन्द्रपृथुयादोमिः तुरङ्गमतरङ्गकैः । विलोलासिकतामत्स्यैः शुशुभे सा चमूधुनी ॥१४३॥ ततः समीकृताशेषस्थलनिम्नमहीतला । अपर्याप्तमहामार्गा यथास्वं प्रसता चमूः ॥१४॥ वनेमकटमुज्झित्वा दानसक्का मदालिनः । न्यलोयन्त नृपेभेन्द्रकरटै प्रक्षरन्मदे ॥१४५॥ रम्यान वनतरून् हित्वा राजस्तम्बरमानमून् । 'प्राश्रयन्मधुपाः प्रायः प्रत्यग्रं लोकरञ्जनम् ॥१४६॥ नृपं वनानि रम्याणि प्रत्यगृह्णचिवाध्वनि । फलपुष्पमरानम्रः सान्द्रच्छायैर्महागुमैः ॥१४७॥ तदा बनलतापुष्पपल्लवान करपल्लवैः । भाजहारावतंसादिविन्यासाय वधूजनः ॥१४८॥ ध्रुवमक्षीणपुष्पदि प्राप्तास्ते वनशाखिनः । यसैनिकोपभोगेऽपि न जहुः पुष्पसंपदम् ॥१४९॥ हयहेषितमातङ्ग-बृहबृंहितनिस्वनैः । मुखरं तबलं शष्पसरोवरमथासदत् ॥१५०॥ यदम्बुजरजःपुञ्जपिञ्जरीकृतवीचिकम् । कनकद्रवसच्छायं बिभर्ति स्माम्बुशीतलम् ॥१५॥ हो ॥१३९।। घोड़ोंकी टापोंसे उठी हुई धूल आगे-आगे उड़ रही थी जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह वनजंघको मार्ग दिखानेके लिए ही आकाश प्रदेशका उल्लंघन कर रही हो॥१४०॥ हाथियोंकी मदधारासे, उनकी सैंडसे निकले हुए जलके छींटोंसे और घोड़ोंकी लार तथा फेनसे पृथ्वीकी सब धूल जहाँको तहाँ शान्त हो गयी थी॥१४१।। तदनन्तर, नगरसे बाहर निकलती हुई वह सेना किसी महानदीके समान अत्यन्त शोभायमान हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार महानदीमें फेन होता है उसी प्रकार उस सेनामें सफेद छत्र थे और नदीमें जिस प्रकार लहरें होती हैं उसी प्रकार उसमें अनेक घोड़े थे ॥१४२।। अथवा बड़े-बड़े हाथी हो जिसमें बड़े-बड़े जलजन्तु थे, घोड़े ही जिसमें तरंगें थीं और चंचल तलवारें ही जिसमें मछलियाँ थीं ऐसी वह सेनारूपी नदी बड़ी ही सुशोभित हो रही थी ॥१४३॥ उस सेनाने ऊँची-नीची जमीनको सम कर दिया था तथा वह चलते समय बड़े भारी मार्गमें भी नहीं समाती थी इसलिए वह अपनी इच्छानुसार जहाँ-तहाँ फैलकर जा रही थी॥१४४॥'प्रायः नवीन वस्तही लोगोंको अधिक आनन्द देती है, लोकमें जो यह कहावत प्रसिद्ध है वह बिलकुल ठीक है इसीलिए तो मदके लोभी भ्रमर जंगली हाथियोंके गण्डस्थल छोड़-छोड़कर राजा वनजंघकी सेनाके हाथियोंके मद बहानेवाले गण्डस्थलोंमें निलीन हो रहे थे और सुगन्धके लोभी कितने ही भ्रमर वनके मनोहर वृक्षोंको छोड़कर महाराजके हाथियोंपर आ लगे थे ॥१४५-१४६।। मार्गमें जगह-जगहपर फल और फूलोंके भारसे झुके हुए तथा घनी छायावाले बड़े-बड़े वृक्ष लगे हुए थे। उनसे सा मालम होता था मानो मनोहर वन उन वृक्षोंके द्वारामार्गमें महाराज वनजंघका सत्कार ही कर रहे हों ॥१४७। उस समय स्त्रियोंने कर्णफूल आदि आभूषण बनानेके लिए अपने करपल्लवोंसे वनलताओंके बहुत-से फूल और पत्ते तोड़ लिये थे ॥१४८॥ मालूम होता है कि उन बनके वृक्षोंको अवश्य ही अक्षीणपुष्प नामकी ऋद्धि प्राप्त हो गयी थी इसीलिए तो सैनिकोंपारा बहुत-से फूल तोड़ लिये जानेपर भी उन्होंने फूलोंकी शोभाका परित्याग नहीं किया था॥१४९॥ अथानन्तर घोड़ोंके हींसने और हाथियोंकी गम्भीर गर्जनाके शब्दोंसे शब्दायमान वह सेना क्रम-क्रमसे शष्प नामक सरोवरपर जा पहुँची ॥१५०॥ ... उस सरोवरकी लहरें कमलोंकी परागके समूहसे पीली-पीली हो रही थी और इसीलिए बह पिघले हुए सुवर्णके समान पीले तथा शीतल जलको धारण कर रहा था ॥ १५१ ॥ १. प्रसरन्ति स्म । २. सर्पद्रेणवः अ०, म०, स०। ३. उपदेष्टुम् । ४. जलचरः । ५. मदासक्ताः । -शक्ताः अ०, ५०, द० । ६. निलीना बभूवुः । ७. गण्डस्थले । ८. श्रायन्ति स्म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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