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________________ अष्टमं पर्व १७१ ततः प्रहतगम्भीरपटहध्वानसंकुलम् । पुरमुत्तोरणं पश्यन् स विवेश नृपालयम् ॥१५॥ तत्र' श्रीभवने रम्ये सर्वर्तुसुखदायिनि । श्रीमस्या सहसंप्रीत्या वज्रजकोऽवसत् सुखम् ॥४६॥ स राजसदनं रम्यं प्रीत्यामुष्यै प्रदर्शयन् । तत्र तां रमयामास खिमां गुरुवियोगतः ॥४७॥ पण्डिता सममायाता सखीनामग्रणीः सती । तामसौ रक्षयामास विनोदैर्तनादिमिः ॥४८॥ मोगैरनारतैरेवं काले गच्छत्यनुक्रमात् । श्रीमती सुषुवे पुत्रान् म्येकपञ्चाशतं यमान ॥४९॥ अथान्येधुर्महाराजो वज्रबाहुमहायुतिः । शरदम्बुधरोत्थानं सौधाग्रस्थो निरूपयन् ॥५०॥ दृष्ट्वा तद्विलयं सद्यो निर्वेदं परमागतः । विरकस्यास्य चित्तेऽभूदिति चिन्ता गरीयसी ॥५१॥ पश्य नः पश्यतामेव कथमेष शरदनः । प्रासादाकृतिरुद्भूतो विलीनश्च क्षणान्तरे ॥५२॥ संपदविलायं नःक्षणादेषा विलास्यते । लक्ष्मीस्तरिदविलोलेयं इत्वयों यौवनश्रियः ॥५३॥ "आपातमात्ररम्याश्च भोगाः पर्यन्ततापिनः । प्रतिक्षणं गलत्यायुर्गलबालिजलं' यथा ॥५४॥ रूपमारोग्यमैश्वर्यमिष्टबन्धुसमागमः । प्रियाजनारतिश्शेति सर्वमप्यनवस्थितम् ॥५५॥ विचिन्त्येति चलां लक्ष्मी प्रजिहासुः सुधीरसौ । अभिषिच्य सुतं राज्ये वज्रजामतिष्ठिपत् ॥५६॥ स राज्यमोगनिर्विण्णस्तूर्ण यमधरान्तिके । नूपैः साई सहखाई मितैर्दीक्षामुपाददे ॥५॥ हुआ पवित्र प्रसाद उन दोनों दम्पतियोंके समीप पहुँचाते थे। तदनन्तर बजती हुई भेरियोंके गम्भीर शब्दसे व्याप्त तथा अनेक तोरणोंसे अलंकृत नारकी शोभा देखते हुए वनजंघने राजभवनमें प्रवेश किया ॥४५॥ वह राजभवन अनेक प्रकारको लक्ष्मीसे शोभित था, महा मनोहर था और सर्व ऋतुओंमें सुख देनेवाली सामग्रीसे सहित था। ऐसे ही राजमहलमें वनजंघ श्रीमतीके साथ-साथ बड़े प्रेम और सुखसे निवास करता था॥४६॥ यद्यपि माता-पिता आदि गुरुजनोंके वियोगसे श्रीमती खिन्न रहती थी परन्तु वजजंघ बड़े प्रेमसे अत्यन्त सुन्दर राजमहल दिखलाकर उसका चित्त बहलाता रहता था॥४७॥ शीलव्रत धारण करनेवाली तथा सब सखियोंमें श्रेष्ठ पण्डिता नामकी सखी भी उसके साथ आयी थी। वह भी नृत्य आदि अनेक प्रकारके विनोदोंसे उसे प्रसन्न रखती थी॥४८॥ इस प्रकार निरन्तर भोगोपभोगोंके द्वारा समय व्यतीत करते हुए उसके क्रमशः उनचास युगल अर्थात् अट्ठानबे पुत्र उत्पन्न हुए ॥४९॥ तदनन्तर किसी एक दिन महाकान्तिमान् महाराज वनबाहु महलकी छतपर बैठे हुए शरद् ऋतुके बादलोंका उठाव देख रहे थे ॥५०॥ उन्होंने पहले जिस बादलको उठता हुआ देखा था उसे तत्कालमें विलीन हुआ देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे उसी समय संसारके सब भोगोंसे विरक्त हो गये और मनमें इस प्रकार गम्भीर विचार करने लगे ॥५१॥ देखो, यह शरद् ऋतुका बादल हमारे देखते-देखते राजमहलकी आकृतिको धारण किये हुए था और देखते-देखते ही क्षण-भरमें विलीन हो गया ॥५२॥ ठीक, इसी प्रकार हमारी यह सम्पदा भी मेघके समान क्षणभरमें विलीन हो जायेगी। वास्तवमें यह लक्ष्मी बिजलीके समान चंचल है और यौवनकी शोभा भी शीघ्र चली जानेवाली है ॥५३॥ ये भोग प्रारम्भ कालमें ही मनोहर लगते हैं किन्तु अन्तकालमें ( फल देनेके समय ) भारी सन्ताप देते हैं। यह आयु भी फूटी हुई नालोके जलके समान प्रत्येक क्षण नष्ट होती जाती है ॥५४॥ रूप, आरोग्य, ऐश्वर्य, इष्ट-बन्धुओंका समागम और प्रिय स्त्रीका प्रेम आदि सभी कुछ अनवस्थित हैं-क्षणनश्वर हैं ॥५५॥ इस प्रकार विचार कर चंचल लक्ष्मीको छोड़नेके अभिलाषी बुद्धिमान् राजा वजबाहुने अपने पुत्र वनजंघका अभिषेक कर उसे राज्यकार्यमें नियुक्त किया ॥५६॥ और स्वयं १. राजालये। २. लक्ष्मीनिवासे । ३. मातापितवियोगात् । ४. प्रशस्ता । ५. एकोनम् । ६. युगलान् । ७. धनकनकसमृद्धिः। ८. अभ्रमिव विलास्यते विलयमेष्यति । ९.व्यभिचारिण्यः । १०. अनुभवनकालमात्रम् । ११. पतदघाटीनीरम् । १२. अस्थिरम् । १३. प्रहातुमिच्छुः । १४. शीघ्रम् । १५. पञ्चशतप्रमितः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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