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________________ १७० आदिपुराणम् वज्रजकानुजां कन्यामनुरूपामनुन्धरीम् । वज्रबाहुर्विभूत्यासावदितामिततेजसे ॥३३॥ चक्रिसूनुं तमासाथ सुतरां पिप्रिये सती। अनुन्धरी नवोढासौ वसन्तमिव कोकिला ॥३४॥ अथ चक्रधरः पूजासत्कारैरमिपूजितम् । स्वपुरं प्रति यानाय व्यसृजत् तद्वधूवरम् ॥३५॥ हस्त्यश्वरथपादात रत्नं देशं सकोशकम् । तदान्वयिनिकं पुत्र्यै ददौ चक्रधरो महत् ॥३६॥ अथ प्रयाणसंक्षोमाद् दम्पत्योस्तपुरं तदा । परमाकुलतां भेजे सद्गुणैरुन्मनायितम् ॥३०॥ ततः प्रस्थानगम्भीरभेरीध्वानैः शुभे दिने । प्रयाणमकरोच्छीमान् वज्रजाः सहाजनः ॥३८॥ वज्रबाहुमहाराजो देवी चास्य वसुन्धरा । वनजर सपनीकं ब्रजन्तमनुजग्मतुः ॥३१॥ पौरवर्ग तथा मन्त्रिसेनापतिपुरोहितान् । सोऽर्नुवजितुमायाताना तिराद ब्यसर्जयत् ॥४०॥ हस्त्यश्वरथभूयिष्ठं साधनं सहपत्तिकम् । संवाहयन् स संप्रापत् पुरमुत्पलखेटकम् ॥४॥ पराद्धर्थरचनोपेतं सोत्सवं प्रविशन् पुरम् । पुरन्दर इवामासीद् वज्रजहोऽमितचुतिः॥४२॥ पौराङ्गना महावीथीविशन्तं तं प्रियान्वितम् । सुमनोऽञ्जलिमिः प्रोत्या चकरुः सौधसंश्रिताः ॥४३॥ पुष्पाक्षतयुतां पुण्यां शेषां पुण्याशिषा समम् । प्रजाः समन्ततोऽभ्येत्य दम्पती तावलम्मयन् ॥४४॥ वनजंघकी एक अनुन्धरी नामकी छोटी बहन थी जो उसीके समान सुन्दरी थी। राजा वजबाहुने वह बड़ी विभूतिके साथ चक्रवर्तीके बड़े पुत्र अमिततेजके लिए प्रदान की थी॥३॥ जिस प्रकार कोयल वसन्तको पाकर प्रसन्न होती है उसी प्रकार वह नवविवाहिता सती अनुन्धरी, चक्रवर्तीके पुत्रको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुई थी ॥ ३४ ॥ इस प्रकार जब सब कार्य पूर्ण हो चुके तब चक्रवर्ती वदन्त महाराजने अपने नगरको वापस जानेके लिए पूजा सत्कार आदिसे सबका सम्मान कर वध-बरको बिदा कर दिया ॥३५॥ उस समय चक्रवर्तीने पुत्रीके लिए हाथी, घोड़े, रथ, पियादे, रन, देश और खजाना आदि कुलपरम्परासे चला आया बहुत-सा धन दहेजमें दिया था ॥३६॥ वनजंघ और श्रीमतीने अपने गुणोंसे समस्त पुरवासियोंको उन्मुग्ध कर लियाथा इसलिए उनके जानेका क्षोभकारक समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अत्यन्त व्याकुल हो उठे थे॥३७॥ तदनन्तर किसी शुभदिन श्रीमान् वनजंघने अपनी पत्नी श्रीमतीके साथ प्रस्थान किया। उस समय उनके प्रस्थानको सूचित करनेवाले नगाड़ोंका गम्भीर शब्द हो रहा था॥३८॥ वजजंघ अपनी पत्नीके साथ आगे चलने लगे और महाराज वज्रबाहु तथा उनकी पत्नी वसुन्धरा महाराझी उनके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥३९॥ पुरवासी, मन्त्री, सेनापति तथा पुरोहित आदि जो भी उन्हें पहुँचाने गये थे वनजंघने उन्हें थोड़ी दूरसे वापस बिदा कर दिया था॥४०॥ हाथी, घोड़े, रथ और पियादे आदिकी विशाल सेनाका संचालन करता हुआ वनजंघ क्रमक्रमसे उत्पलखेटक नगर में पहुँचा ॥४१॥ उस समय उस नगरीमें अनेक उत्तम-उत्तम रचनाएँ की गयी थीं, कई प्रकारके उत्सव मनाये जा रहे थे । उस नगर में प्रवेश करता हुआ अतिशय देदीप्यमान वनजंघ इन्द्र के समान शोभायमान हो रहा था॥४२॥ जब वाजंघने अपनी प्रिया श्रीमतीके साथ नगरकी प्रधान-प्रधान गलियोंमें प्रवेश किया तब पुरसुन्दरियोंने महलोंकी छतोंपर चढ़कर उन दोनोंपर बड़े प्रेमके साथ अंजलि भर-भरकर फूल बरसाये थे॥४३॥ उस समय सभी ओरसे प्रजाजन आते थे और शुभ आशीर्वादके साथ-साथ पुष्प तथा अक्षतसे मिला १. गमनाय । २. प्राहिणोत् । ३. अनु पश्चात्, अयः अयनं गमनम् अन्वयः स्यादित्यर्थः । अनवस्थितम् अन्वयः अनुगमनम् अस्याः अस्तीत्यस्मिन्नर्थे इन् प्रत्यये अन्वयिन इति शब्दः, ततः ङीप्रत्यये सति अन्वयिनीति सिद्धम्। अन्वयिन्याः सम्बन्धि द्रष्यमित्यस्मिन्नथें ठणि सति आन्वयिनिकमिति सिद्धम् । [जामातृदेयं व्यमित्यर्थः]। ४. अनुगन्तुम् । ५. अनतिदूरात् । ६. सम्यग् गमयन् । ७. किरन्ति स्म। ८. प्रापयन्ति स्म ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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