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________________ १०६ आदिपुराणम् स राज्यं सुचिरं भुक्त्वा कदाचिद् भोगनिःस्पृहः । भवपितरि निक्षिप्तराज्यमारो महोदयः ॥१४॥ सम्पगदर्शनपूतात्मा गृहीतोपासकनतः । निबदसुरलोकायुर्विशुद्धपरिणामतः ॥१४॥ कृत्वानशनसचर्यामवमोदर्यमप्यदः । यथोचितनियोगेन' योगेनान्तेऽस्यजत् तनुम् ॥१२॥ माहेन्द्रकल्पेऽनल्पढिरभूदेष सुराप्रणीः । अणिमादिगुणोपेतः ससाम्बुधिमितस्थितिः ॥१३॥ स चान्यदा महामेरौ नन्दने स्वामुपागतम् । क्रीडाहेतोर्मया सादं रष्ट्वातिस्नेहनिर्मरः ॥१४॥ कुमार परमो धर्मों जैनाभ्युदयसाधनः । न विस्मार्यस्त्वयेत्येवं त्वां तदान्वशिषत्तराम् ॥१५॥ नमस्खचरराजेन्द्रमस्तकारूढशासनः। सहस्रबल इत्यासीद् मवस्पितृपितामहः॥४६॥ स देव देवे निक्षिप्य लक्ष्मी शतबले सुते । जग्राह परमां दीक्षां जैनी निर्वाणसाधनीम् ॥१७॥ विजहार महीं कृत्स्ना द्योतयन् स तपोऽशुमिः । मिथ्यान्धकारघटनां विघटग्योभुमानिव ॥१४॥ क्रमात् कैवल्यमुत्पाथ पूजितो नूसुरासुरैः । ततोऽनन्तमपारं च संप्रापच्छाश्वतं पदम् ॥१४९॥ तथा युष्मपितायुष्मन् राज्यभूरिभरं वशी। स्वयि निक्षिप्य बैराग्यात् महाप्रावाज्यमास्थितः ।।१५०॥ पुत्रनप्तृमिरन्यैश्च नमश्वरनराधिपः । साई तपश्चरन्नेष मुक्तिलक्ष्मी जिघृक्षति ॥५१॥ धर्माधर्मफलस्यैते दृष्टान्तत्वेन दर्शिताः । युज्मवंश्याः खगाधीशाः "सुप्रतीतकथानकाः ॥१५२॥ गये हैं जो अपने मनोहर गुणोंके द्वारा प्रजाको हमेशा सुयोग्य राजासे युक्त करते थे॥१३९। उन भाग्यशाली शतबलने चिरकाल तकराज्यभोग कर आपके पिताके लिए राज्यका भार सौंप दिया था और स्वयं भोगोंसे निस्पृह हो गये थे॥१४०। उन्होंने सम्यग्दर्शनसे पवित्र होकर श्रावकके व्रत प्रहण किये थे और विशुद्ध परिणामोंसे देवायुका बन्ध किया था॥१४१।। उनने उपवास अवमोदर्य आदि सत्प्रवृत्तिको धारण कर आयुके अन्तमें यथायोग्य रीतिसे समाधिमरणपूर्वक शरीर छोड़ा ॥१४२॥ जिससे महेन्द्रस्वर्गमें बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंके धारक श्रेष्ठ देव हुए। वहाँ वे अणिमा, महिमा आदि गुणोंसे सहित थे तथा सात सागर प्रमाण उनकी स्थिति थी॥१४।। किसी एक दिन आप सुमेरु पर्वतके नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेके लिए मेरे साथ गये हुए थे वहींपर वह देव भी आया था। आपको देखकर बड़े स्नेहके साथ उसने उपदेश दिया था कि 'हे कुमार, यह जैनधर्म ही उत्तम धर्म है, यही स्वर्ग आदि अभ्युदयोंकी प्राप्तिका साधन है इसे तुम कभी नहीं भूलना' ॥१४४-१४५।। यह कथा कहकर स्वयंबुद्ध कहने लगा कि "हे राजन्, आपके पिताके दादाका नाम सहस्रबल था। अनेक विद्याधर राजा उन्हें नमस्कार करते थे और अपने मस्तकपर उनको आज्ञा धारण करते थे ॥१४६। उन्होंने भीअपने पुत्र शतबल महाराजको राज्य देकर मोक्षप्राप्त करनेवाली उत्कृष्ट जिनदीक्षा ग्रहण की थी॥१४७।। वे तपरूपी किरणोंके द्वारा समस्त पृथिवीको प्रकाशित करते और मिथ्यात्वरूपी अन्धकारकी घटाको विघटित करते हुए सूर्यके समान विहार करते रहे ॥१४८॥ फिर क्रमसे केवलबान प्राप्त कर मनुष्य,देव और धरणेन्द्रोंके द्वारा पूजित हो अनन्त अपार और नित्य मोक्ष पदको प्राप्त हुए ॥१४९॥ हे आयुष्मन् , इसी प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करनेवाले आपके पिता भी आपके लिए राज्यभार सौंप कर वैराग्यभावसे उत्कृष्ट जिनदीक्षाको प्राप्त हुए हैं और पुत्र, पौत्र तथा अनेक विद्याधर राजाओंके साथ तपस्या करते हुए मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त करना चाहते हैं ॥१५०-१५१॥ हे राजन्, मैंने धर्म और अधर्मके फलका दृष्टान्त देनेके लिए ही आपके वंशमें उत्पन्न हुए उन १. कृत्येन । २. समाधिना। ३. नितरामनुशास्ति स्म । ४.-खेचर-1०, ल०। ५. विजिगीषी (जयनशीले इत्यर्थः) 'पर्जन्ये राशि निर्माण व्यवहर्तरि भर्तरि। मुखें बाले जिगीषौ च देवोक्तिर्नरकुष्ठिनि ॥' इत्यभिषानात । ६. इन्द्रियजयी। ७. माश्रितः। ८.गहीतमिच्छति । ९.बंशे भवाः। १०. कर्थव मानक: पटहः कथानकः सुप्रतीतः प्रसिद्धः कथानको येषां ते तथोक्ताः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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