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________________ तृतीयं पर्व ८५ तत्रायैः पञ्चमिणां कुलकृझिा कृतागसाम् । हाकारलक्षणो दण्डः समवस्थापितस्तदा ॥२१॥ हामाकारश्च दण्डोऽन्यैः पञ्चभिः संप्रवर्तितः । पञ्चभिस्तु ततः शेषैर्हामाधिकारलक्षणः ॥२१५॥ शरीरदण्डनं चैव वधबन्धादिलक्षणम् । नृणां प्रबलदोषाणां भरतेन नियोजितम् ॥२१॥ यदायुरुतमेतेषामममादिप्रसंख्यया । क्रियते तद्विनिश्चित्यै परिभाषोपवर्णनम् ॥२१७॥ पूर्वाङ्गं वर्षलक्षाणामशीतिश्चतुरुत्तरा । तद्वर्गितं मवेत् पूर्व तस्कोटी पूर्वकोव्यसौ ॥२१॥ पूर्व चतुरशोतिघ्नं पूर्वाङ्गं परिभाष्यते । पूर्वाङ्गताडितं तत्तु पर्वाङ्ग पर्वमिष्यते ॥२१९॥ गुणाकारविधिः सोऽयं योजनीयो यथाक्रमम् । उत्तरेष्वपि संख्यानविकल्पेषु निराकुलम् ॥२२०॥ तेषां संख्यानभेदानां नामानीमान्यनुक्रमात् । कीर्त्यन्तेऽनादि सिद्धान्तपदरूढीनि' यानि ॥२२॥ पूर्वाङ्ग च तथा पूर्व पर्वाङ्गं पर्वसाहयम् । नयुताङ्गं परं तस्मामयुतं च ततः परम् ॥२२२॥ कुमुदाङ्गमतो विदि कुमुदाहमतः परम् । पनालंच ततः पन्ननलिनागमतोऽपि च ।।२२३।। भी कहलाते थे ।।२१३।। उन कुलकरोंमें-से आदिके पाँच कुलकरोंने अपराधी मनुष्योंके लिए 'हा' इस दण्डको व्यवस्था की थी अर्थात् खेद है कि तुमने ऐसा अपराध किया। उनके आगेके पाँच कुलकरोंने 'हा' और 'मा' इन दो प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था की थी अर्थात खेद है जो तुमने ऐसा अपराध किया, अब आगे ऐसा नहीं करना। शेष कुलकरोंने 'हा' 'मा' और 'धिक' इन तीन प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था की थी अर्थात् खेद है, अब ऐसा नहीं करना और तुम्हें धिकार है जो रोकनेपर भी अपराध करते हो २१४-२१५।। भरत चक्रवर्तीके समय लोग अधिक दोष या अपराध करने लगे थे इसलिए उन्होंने वध, बन्धन आदि शारीरिक दण्ड देनेकी भी रीति चलायी थी ।।२१६।। इन मनुओंकी आयु ऊपर अमम आदिकी संख्याद्वारा बतलायोगयी है इसलिए अब उनका निश्चय करनेके लिए उनकी परिभाषाओंका निरूपण करते हैं ।।२१७॥ चौरासी लाख वर्षोंका एक पूर्वाङ्ग होता है। चौरासी लाखका वर्ग करने अर्थात् परस्पर गुणा करनेसे जो संख्या आती है उसे पूर्व कहते हैं ( ८४०००००४८४००००० =७०५६००००००००००) इस संख्यामें एक करोड़का गुणा करनेसे जो लब्ध आवे उतना एक पूर्व कोटि कहलाता है। पूर्वकी संख्यामें चौरासीका गुणा करनेपर जो लब्ध हो उसे पर्वाङ्ग कहते हैं तथा पर्वाङ्गमें पूर्वाङ्ग अर्थात् चौरासी लाखका गुणा करनेसे पर्व कहलाता है ।।२१८-२१९॥ इसके आगे जो नयुताङ्ग नयुत आदि संख्याएँ कही हैं उनके लिए भी क्रमसे यही गुणाकार करना चाहिए। भावार्थ-पर्वको चौरासीसे गुणा करनेपर नयुतार, नयुताङ्गको चौरासीलाखसे गुणा करनेपर नयुत; नयुक्तको चौरासीसे गुणा करनेपर कुमुदाज, समुदानको चौरासी लाखसे गुणा करनेपर कुमुद कुमुदको चौरासीसे गुणा करनेपर पमान, और पनागको चौरासी लालसे गुणा करनेपर पन्न; पाको चौरासीसे गुणा करनेपर नलिमान, और नलिनाङ्गको चौरासी लाखसे गुणा करनेपर नलिन होता है। इसी प्रकार गुणा करनेपर आगेकी संख्याओंका प्रमाण निकलता है ।२२०|| अब क्रमसे उन संख्याके भेदोंके नाम कहे जाते हैं जो कि अनादिनिधन जैनागममें रूद है ।।२२।। पूर्वाङ्ग, पूर्व, पर्वाङ्ग, पर्व, नयुताङ्ग, नयुत, कुमुदाग, कुमुद, पद्माङ्ग, पन, नलिनाङ्ग, नलिन, कमलाङ्ग, कमल, तुटया, तुटिक, अटटान, १. कुलभूद्भिः म०, ल.। २. शारीरं दण्डनं अ०, ५०, द०, म०, ल.। ३. पर्वाङ्ग-अ०, प० । ४. सिद्धान्ते पद-द०,ल.। ५.-रूढानि म०प० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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