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________________ १२ आदिपुराणम् 'तदुपर्श गजादीनां बभूवारोहणक्रमः । 'कुथाराङ्कुशपर्याणमुखमाण्डायुपक्रमैः ॥१९॥ पुनरन्तरमत्राभूदसंख्येयाब्दकोटयः ।ततोऽष्टमो मनुर्जातचक्षुष्मानिति शब्दितः ॥१२०॥ पद्मागप्रमितायुष्कचाणनां पञ्चसप्ततिः । षट्छतान्यप्युदप्रश्रीरुच्छ्तिाङ्गो बभूव सः ॥१२॥ तस्य कालेऽभवत्तेषां अणं पुत्रमुखक्षणम् । अदृष्टपूर्वमार्याणां महदुल्लासकारणम् ।।१२२॥ ततः सपदि संजातसाध्वसानार्यकांस्तदा । तद्याथात्म्योपदेशेन स संत्रासमयौनझयत् ।।१२।। चक्षुष्मानिति तेनाभूत् तत्काले ते यतोऽर्मकाः । जनयित्रोः क्षणं जाताचक्षुदर्शनगोचरम् ॥१२॥ पुनरप्यन्तरं तावद् वर्षकोटीर्विलस्य सः । यशस्वानित्यभूनाम्ना यशस्वी प्रक्मो मनुः ॥१२५|| कुमुदप्रमितं तस्य परमायुर्महीयसः । षट्छतानि च पञ्चाशदनषि वपुरुच्छ्रितिः ॥१२६।। तस्य काले प्रजा 'जन्यमुखालोकपुरस्सरम् । कृताशिषः क्षणं स्थिस्या लोकान्तरमुपागमन् ।।१२७।। यशस्वानित्यभूत्तेन शशंसुस्तयशो यतः । प्रजाः "सुप्रजसः प्रीताः "पुत्राशासनदेशनात् ॥१२८॥ ततोऽन्तरमतिक्रम्य तप्रायोग्याब्दसंमितम् । अमिचन्द्रोऽभवनाम्ना चन्द्रसौम्याननो मनुः ॥१२९।। "कुमुदामितायुको ज्वलन्मुकुटकुण्डलः । पञवर्गाप्रषट्चापशतोत्सेधः स्फुरत्तनुः ॥१३०॥ शरीर सात सौ धनुष ऊँचा और लक्ष्मीसे विभूषित था। इन्होंने हाथी, घोड़ा आदि सवारीके योग्य पशुओंपर कुथार, अंकुश, पलान, तोबरा आदि लगाकर सवारी करनेका उपदेश दिया था ॥११६-११९।। इनके बाद असंख्यात करोड़ वर्षोंका अन्तराल रहा। फिर चक्षुष्मान नामके आठवें मनु उत्पन्न हुए, वे पद्माङ्ग प्रमाण आयुके धारक थे और छह-सौ पचहत्तर धनुष ऊँचे थे। उनके शरीरकी शोभा बड़ी ही सुन्दर थी। इनके समयसे पहलेके लोग अपनी सन्तानका मुख नहीं देख पाते थे, उत्पन्न होते ही माता-पिताकी मृत्यु हो जाती थी परन्तु अब वेक्षण-भर पुत्रका मुख देखकर मरने लगे। उनके लिए यह नयी बात थी इसलिए भयका कारण हुई। उस समय भयभीत हुए आर्य पुरुषोंको चक्षुष्मान् मनुने यथार्थ उपदेश देकर उनका भय छुड़ाया था। चूँकि उनके समय माता पिता अपने पुत्रोंको क्षण-भर देख सके थे इसलिए उनका चक्षुष्मान यह सार्थक नाम प्रसिद्ध हुआ ॥१२०-१२४॥ तदनन्तर करोड़ों वर्षोंका अन्तर व्यतीत कर यशस्वान् नामके नौवें मनु हुए। वे बड़े ही यशस्वी थे। उन महापुरुषकी आयु कुमुद प्रमाण वर्षोंकी थी। उनके शरीरकी ऊँचाई छह सौ पचास धनुषकी थी। उनके समयमें प्रजा अपनो सन्तानोंका मुख देखनेके साथ-साथ उन्हें आशीर्वाद देकर तथा क्षण-भर ठहर कर परलोक गमन करती थी-मृत्युको प्राप्त होती थी। इनके उपदेशसे प्रजा अपनी सन्तानोंको आशीर्वाद देने लगी थी इसलिए उत्तम सन्तानवाली प्रजाने प्रसन्न होकर इनको यश वर्णन किया इसी कारण उनका यशस्वान् यह सार्थक नाम पड़ गया था ।।१२५-१२८।। इनके बाद करोड़ों वर्षोंका अन्तर व्यतीत कर अभिचन्द्र नामके दसवें मनु उत्पन्न हुए। उनका मुख चन्द्रमाके समान सौम्य था, कुमुदाङ्ग प्रमाण उनकी आयु थी, उनका मुकुट और कुण्डल अतिशय देदीप्यमान था। वे छह सौ पच्चीस धनुष ऊँचे तथा देदीप्यमान १. तस्य प्रथमोपदेशः आदातुक्रमोपमिति नपुंसकत्वम् । २. कुठाराङ्कश-अ०, ५०, म०,ल.। कुथश्चाङ्कश-द० । ३. पञ्चविंशतिशून्याग्रा नवप्रमाणचतुरशीतिहतिहि पद्माङ्गवर्षप्रमाणम् । ४. तद्शतान्य-अ०, द०, स० । ५. जननीजनकयोः। ६. पञ्चविंशतिशून्याग्रमष्टप्रमाणचतुरशीतिसंगुणनं कुमुदवर्षप्रमाणम् । ७.-पि च तनूच्छितिः द०,५०,म०,ल०। ८. जन्यः पुत्रः । ९. कारणेन। १०. शोभनाः प्रजाः पुत्रा यासां ताः सुप्रजसः। 'मन्दुस्सोः सक्थिः हलेर्वाम्' इत्यनुवर्तमाने 'अस्प्रजायाः' इति समासान्तः । ११. आशासनम् आशीर्वचनम् । १२. विंशतिशम्याधिका सप्तप्रमितिचतुरशोतिहतिः कुमुदाङ्गवर्षप्रमाणम् । १३ -प्रमायु-अ०, स०, ८०,म. १०, ल०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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