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________________ ३७ द्वितोयं पर्व जलजबाफलश्रेणीतन्तुपुष्पाम्बरश्रयात् । चारणलिजुषे तुभ्यं नमोऽक्षीणमहर्द्धये ॥७३॥ स्वमेव परमो बन्धुस्त्वमेव परमो गुरुः । त्वामेव सेवमानानां भवन्ति ज्ञानसंपदः ॥७॥ त्वयैय भगवन् विश्वा विहिता धर्मसंहिता' । अत एव नमस्तुभ्यममी कुर्वन्ति योगिनः ॥७५॥ त्वत्त एव परं श्रेयो मन्यमानास्ततो वयम् । तव पादानिपच्छायां त्वय्यास्तिक्योदुपास्महे ॥७६॥ वाग्गुप्तेस्त्वरस्तुतौ हानिर्मनोगुप्तेस्तव स्मृतौ । कायगुप्तेः प्रणामे ते काममस्तु सदापि नः ॥७॥ स्तुत्वेति स्तुतिमिः स्तुत्यं मदन्तं भुवनाधिकम् । पुराणश्रुतिमेचैनां तत्फलं प्रार्थयामहे ॥७॥ पुराणश्रुतितो धर्मो योऽस्माकममिसंस्कृतः । पुराणकवितामेव तस्मादाशास्महे वयम् ॥७९॥ चिन्तवन कर सकते हैं, समस्त द्वादशाङ्गका अन्तर्मुहूर्तमें शब्दों-द्वारा उच्चारण कर सकते हैं और शरीरसम्बन्धी अतुल्य बलसे सहित हैं अतः आपको नमस्कार हो ।।७२।। हे देव, आप जलचारण, जंघाचारण, फलचारण, श्रेणीचारण, तन्तुचारण, पुष्पचारण और अम्बरचारण आदि चारण ऋद्धियोंसे युक्त हैं अर्थात् (१) आप जलमें भी स्थलके समान चल सकते हैं तथा ऐसा करनेपर जलकायिक और जलचर जीवोंको आपके द्वारा किसी प्रकारकी बाधा नहीं होगी। (२) आप बिना कदम उठाये ही आकाशमें चल सकते हैं । (३) आप वृक्षोंमें लगे फलोंपर-से गमन कर सकते है औ र ऐसा करनेपर भी वे फल फल वृक्षसे टूटकर नीचे नहीं गिरेंगे। (४) आप आकाशमें श्रेणीबद्ध गमन कर सकते हैं, बीच में आये हुए पर्वत आदि भी आपको नहीं रोक सकते । (५) आप सूत अथवा मकड़ीके जालके तन्तुओंपर गमन कर सकते हैं पर वे आपके भारसे टूटेंगे नहीं। (६) आप पुष्पोंपर भी गमन कर सकते हैं परन्तु वे आपके भारसे नहीं टूटेंगे और न उसमें रहनेवाले जीवोंको किसी प्रकारका कष्ट होगा। और (७) इनके सिवाय आप आकाशमें भी सर्वत्र गमनागमन कर सकते हैं । इसलिए आपको नमस्कार हो । हे स्वामिन् , आप अक्षीण ऋद्धिके धारक हैं अर्थात् आप जिस भोजनशालामें भोजन कर आवें उसका भोजन चक्रवर्तीके कटकको खिलानेपर भी क्षीण नहीं होगा और आप यदि छोटेसे स्थानमें भी बैठकर धर्मोपदेश आदि देंगे तो उस स्थानपर समस्त मनुष्य और देव आदिके बैठनेपर भी संकीर्णता नहीं होगी। इसलिए आपको नमस्कार हो ।।७३।। हे नाथ, संसारमें आप ही परम हितकारी बन्धु हैं, आप ही परमगुरु हैं और आपकी सेवा करनेवाले पुरुषोंको ज्ञानरूपी सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ।।७४॥ हे भगवन् , इस संसारमें आपने ही समस्त धर्मशास्त्रोंका वर्णन किया है अतः ये बड़े-बड़े योगी आपको ही नमस्कार करते हैं।७५॥ हे देव, मोक्षरूपी परम कल्याणकी प्राप्ति आपसे ही होती है ऐसा मानकर हम लोग आपमें श्रद्धा रखते हुए आपके चरणरूप वृक्षोंकी छायाका आश्रय लेते हैं ॥७६।। हे देव, आपकी स्तुति करनेसे हमारी वचनगप्तिकी हानि होती है, आपका स्मरण करनेसे मनोगुप्तिमें बाधा पहुँचती है तथा आपको नमस्कार करने में कायगुप्तिकी हानि होती है सो भले ही हो हमें इसकी चिन्ता नहीं, हम सदा ही आपको स्तुति करेंगे, आपका स्मरण करेंगे और आपको नमस्कार करेंगे।।७७।। हे स्वामिन् , जगत्में श्रेष्ठ और स्तुति करनेके योग्य आपकी हम लोगोंने जो ऊपर लिखे अनुसार स्तुति की है उसके फलस्वरूप हमें तिरसठ शलाकापुरुषोंका पुराण सुनाइए, यही हम सब प्रार्थना करते हैं ॥७८॥ हे देव, पुराणके सुननसे हमें जो सुयोग्य धर्मकी प्राप्ति होगी उससे हम कवितारूप पुराणको ही आशा करते हैं ॥७९।। हे नाथ, आपके चरणोंकी १. स्मृतिः । २. निश्चयबुद्धेः । ३.-मेवैतां स०, द०। ४. स्तुतिफलम् । ५. वासितः। ६. प्रार्थयामहे ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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