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________________ आदिपुराणम् 'प्रयान्महति वाङमार्गे खिसोऽर्थ गेहनाटनैः । महाकवितरुच्छायां विश्रमायाश्रयेत् कविः ॥१०२॥ प्रज्ञामूलो गुणोदप्रस्कन्धो वाक्पल्लवोज्ज्वलः । महाकवितरुर्धत्ते यशःकुसुममन्जरीम् ॥१०३॥ प्रज्ञावेलः प्रसादोर्मिर्गुणरत्नपरिग्रहः । महाधानः पृथुस्रोताः कविरम्मोनिधीयते ॥१०॥ यथोक्तमुपयुम्जीध्वं बुधाः काम्यरसायनम् । येन कल्पान्तरस्थायि वपुर्वः स्याद् यशोमयम् ।।१०५॥ यशोधनं चिचीपूणां पुण्यपुण्यपणायिनाम् । परं मूल्यमिहाम्नातं कायं धर्मकथामयम् ॥१०क्षा इदमध्यवसाहिं कथां धर्मानुबन्धिनीम् । प्रस्तुबे प्रस्तुता सद्धिर्महापुरुषगोचराम् ॥१०॥ विस्तीर्णानेकशाखाल्यां" सच्छायां" फलशालिनीम् । आयनिषेवितां रम्यां सती कल्पलतामिव॥१०८॥ प्रसन्मामतिगम्भीरां निर्मला "सुखशीतलाम् । "निर्वापितजगत्तापां महती सस्सीमिव ॥१०९॥ चाहिए ॥१०१।। विशाल शब्दमार्गमें भ्रमण करता हुआ जो कवि अर्थरूपी सघन वनोंमें घूमनेसे खेद-खिन्नताको प्राप्त हुआ है उसे विश्रामके लिए महाकविरूप वृक्षोंकी छायाका आश्रय लेना चाहिए । अर्थात् जिस प्रकार महावृक्षोंकी छायासे मार्गकी थकावट दूर हो जाती है और चित्त हलका हो जाता है उसी प्रकार महाकवियोंके काव्यग्रन्थोंके परिशीलनसे अर्थाभावसे होनेवाली सब खिन्नता दूर हो जाती है और चित्त प्रसन्न हो जाता है ॥१०२॥ प्रतिभा जिसकी जड़ है, माधुर्य, ओज, प्रसाद आदि गुण जिसकी उन्नत शाखाएँ हैं, और उत्तम शब्द ही जिसके उज्ज्वल पत्ते हैं ऐसा यह महाकविरूपी वृक्ष यशरूपी पुष्पमञ्जरीको धारण करता है ॥१०३।। अथवा बुद्धि ही जिसके किनारे हैं, प्रसाद आदि गुण ही जिसमें लहरें हैं, जो गुणरूपी रत्नोंसे भरा हुआ है, उच्च और मनोहर शब्दोंसे युक्त है, तथा जिसमें गुरुशिष्यपरम्परा रूप विशाल प्रवाह चला आ रहा है ऐसा यह महाकवि समुद्रके समान आचरण करता है ॥१०४॥ हे विद्वान् पुरुषो! तुम लोग ऊपर कहे हुए काव्यरूपी रसायनका भरपूर उपयोग करो जिससे कि तुम्हारा यशरूपी शरीर कल्पान्त काल तक स्थिर रह सके। भावार्थ-जिस प्रकार रसायन सेवन करनेसे शरीर पुष्ट हो जाता है उसी प्रकार ऊपर कहे हुए काव्य, महाकवि आदिके स्वरूपको समझकर कविता करनेवालेका यश चिरस्थायी हो जाता है ॥१०५।। जो पुरुष यशरूपी धनका संचय और पुण्यरूपी पण्यका व्यवहार-लेनदेन करना चाहते हैं उनके लिए धर्मकथाको निरूपण करनेवाला यह काव्य मूलधन (पूँजी) के समान माना गया है ।।१०६।। यह निश्चय कर मैं ऐसी कथाको आरम्भ करता हूँ जो धर्मशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाली है, जिसका प्रारम्भ अनेक सज्जन पुरुषोंके द्वारा किया गया है तथा जिसमें ऋषभनाथ आदि महापुरुषोंके जीवनचरित्रका वर्णन किया गया है ॥१०७।। जो धर्मकथा कल्पलताके समान, फैली हुई अनेक शाखाओं (डालियों, कथा-उपकथाओं) से सहित है, छाया (अनातप, १. गच्छन् । २. गहनं काननम् । ३. विश्रामाया--द०, स०, ५०, म०, ल०। ४. अविच्छिन्नशब्दप्रवाहः । ५. चिचीषूणां स०, ८० । पोषितुमिच्छूनाम् । 'च भरणे' इति क्रयादिधातोः सन् तत उप्रत्ययः । ६. पणायिताम् स० । क्रेतणाम् । ७. कथितम् । ८. निश्चित्य । ९. धर्मानुवतिनीम् स०, द० । १०. प्रारंभे । ११. शाखा-कथा। १२. समीचीनपुरातनकाव्यच्छायाम्। उक्तं चालंकारचूडामणिदर्पणे-'मुखच्छायेन यस्य काव्येषु पुरातन काव्यच्छाया संक्रामति स महाकविः' इति । १३. भोगभूमिः । १४. सुखाय शीतलाम् । १५. निर्वासित-म०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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