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________________ आदिपुराणम् धर्मानुबन्धिनी या स्यात् कविता सैव शस्यते । शेषा पापानवायैव सुप्रयुक्तापि जायते ॥६३॥ केचिन्मिथ्यादृशः काव्यं प्रश्नन्ति श्रुतिपेशलम् । 'तरवधर्मानुबन्धित्वान सतां प्रीणनक्षमम् ॥६॥ अव्युत्पन्नतराः केचित् कवित्वाय कृतोद्यमाः । प्रयान्ति हास्यता लोके मका इव विवक्षवः ।।६५|| केचिदन्यवचोलेशानादाय कविमानिनः । छायामारोपयन्स्यन्यां वस्त्रेष्विव वणिग्ब्रुवाः ॥६६॥ संभोक्तुमक्षमाः केचित्सरसां कृतिकामिनीम् । सहायान् कामयन्तेऽन्यानकल्या इव कामुकाः ॥६७।। कंचिदन्यकृतैरथैः शब्दश्च परिवर्तितैः । प्रसारयन्ति काम्यार्थान् प्रतिशिष्ठ्येव वाणिजाः ॥६॥ कंचिद्वर्णोज्ज्वलां वाणी रचयन्त्यर्थदुर्बलाम् । जातुषी कण्ठिकेवासो छायामृमति नोच्छिखाम् ॥६९॥ केचिदर्थमपि प्राप्य तद्योगपदयोजनैः । न सतां प्रीणनायालं लुब्धा लब्धश्रियो यथा ॥७॥ यथेष्टं प्रकृतारम्माः केचिनिर्वहणाकुलाः। कवयो बत सीदन्ति कराकान्तकुटुम्बिवत् ॥१॥ जो अपनी वाणी-द्वारा धर्मकथाकी रचना करते हैं ॥६२॥ कविता भी वही प्रशंसनीय समझी जाती है जो धर्मशास्त्रसे सम्बन्ध रखती है । धर्मशास्त्रके सम्बन्धसे रहित कविता मनोहर होनेपर भी मात्र पापास्रवके लिए होती है ।।६३॥ कितने ही मिथ्यादृष्टि कानोंको प्रिय लगनेवालेमनोहर काव्यग्रन्थोंकी रचना करते हैं परन्तु उनके वे काव्य अधर्मानुबन्धी होनेसे-धर्मशास्त्रके निरूपक न होनेसे-सज्जनोंको सन्तुष्ट नहीं कर सकते ॥६४॥ लोकमें कितने ही कवि ऐसे भी हैं जो काव्यनिर्माणके लिए उद्यम करते हैं परन्तु वे बोलनेकी इच्छा रखनेवाले गूंगे पुरुषकी तरह केवल हँसीको ही प्राप्त होते हैं ॥६५॥ योग्यता न होनेपर भी अपनेको कवि माननेवाले कितने ही लोग दूसरे कवियोंके कुछ वचनोंको लेकर उसकी छाया मात्र कर देते हैं अर्थात् अन्य कवियोंकी रचनामें थोड़ा-सा परिवर्तन कर उसे अपनी मान लेते हैं जैसे कि नकली व्यापारी दूसरोंके थोड़े-से कपड़े लेकर उनमें कुछ परिवर्तन कर व्यापारी बन जाते हैं । ६६ ।। श्रृंगारादि रसोंसे भरी हुई-रसीली कवितारूपी कामिनीके भोगने में-उसकी रचना करने में असमर्थ हुए कितने ही कवि उस प्रकार सहायकोंकी वांछा करते हैं जिस प्रकार कि त्रीसंभोगमें असमर्थ कामीजन ओषधादि सहायकोंकी वांछा करते हैं ॥६७॥ कितने ही कवि अन्य कवियोंद्वारा रचे गये शब्द तथा अर्थमें कुछ परिवर्तन कर उनसे अपने काव्यग्रन्थोंका प्रसार करते हैं जैसे कि व्यापारी अन्य पुरुषों-द्वारा बनाये हुए मालमें कुछ परिवर्तन कर अपनी छाप लगा कर उसे बेचा करते हैं ॥६८॥ कितने ही कवि ऐसी कविता करते हैं जो शब्दोंसे तो सुन्दर होती है परन्तु अर्थसे शून्य होती है। उनकी यह कविता लाखकी बनी हुई कंठीके समान उत्कृष्ट शोभाको प्राप्त नहीं होती ॥६९|| कितने ही कवि सुन्दर अर्थको पाकर भी उसके योग्य सुन्दर पदयोजनाके बिना सज्जन पुरुषोंको आनन्दित करनेके लिए समर्थ नहीं हो पाते जैसे कि भाग्यसे प्राप्त हुई कृपण मनुष्यकी लक्ष्मी योग्य पद-स्थान योजनाके बिना सत्पुरुषोंको आनन्दित नहीं कर पाती ॥७०॥ कितने ही कवि अपने इच्छानुसार काव्य बनानेका प्रारम्भ तो कर देते हैं परन्तु शक्ति न होनेसे उसकी पूर्ति नहीं कर सकते अतः वे टैक्सके भारसे दबे हुए १. तुरित्यव्ययमवधारणार्थे वर्तते। २. स्वरसात् ह । सामर्थ्यात् । ३. -नकल्पा प०, म०, ल० । कल्याः दक्षाः अकल्याः अदक्षाः स्त्रीसम्भोगे असमर्था इत्यर्थः । 'कल्यं सज्ञे प्रभाते च कल्यो नीरोगदक्षयोः' इति विश्वप्रकाशः। अकल्याः पुंस्त्वरहिताः। ४. पर्यायान्तरं नीतः। ५. प्रतिनिधिव्यवहारेण । ६. वर्णसमुदाययोजनैश्च।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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