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________________ तोहि मांहि तेरो पद तू ही हेरि आप ही । हेरे आन थान में न ज्ञान को निधान लहे, आप ही हैं आप और तजि दे विलाप ही । । मेटि दे कलेश के कलाप' आप ओर होय, जहां नहीं धूलि लागे दोउ पुण्य-पाप ही । तिहुं लोक शिखर पै' शिवतिया" नाथ होय. आनंद अनूप लहि मेटे भवताप ही । ! २६ ।। केउ तप-ताप सहे केउ मुखि मौन गहें, केउ हवै नगन रहें जग सों उदास ही ।। तीरथ अटन केउ करत हैं प्रभु काजि, केउ भव भोग तजि करें वनवास ही || केउ गिरकंदरा में बैठि हैं एकांत जाय, केउ पढि धारें विद्या के विलास ही । ऐसे देव चिदानंद कहो कैसे पाइयतु. आप लखें तेई धरे ज्ञान को प्रकास ही । ८७ ।। केउ दौरिं तीरथ को प्रभु जाय ढूंढ़तु हैं, केउ दौरि पहर पै छीके चढ़ि ध्यावे हैं । केउ नाना वेष धारि देव भगवान हेरे, " केउ औंधे मुख झूलि महा दुख पावे हैं ।। ऐसे देव चिदानंद कहो कैसे पाइयत, आतम स्वरूप लखें अविनाशी ध्यावे हैं ८५ ॥ केउ वेद पढ़के पुराण को बखान करे, केउ मंत्र पक्ष ही के लागे अति केवे" हैं । केउ क्रियाकांड में मगन रहें आठो जाम । १ ढूँढो, २ रोना-धोना, २ दुःख- समूह ४ मुद्रित पाठ है- मूलि ५ तीन लोक, ६ पर ७ मुक्ति- रमणी. ८ भ्रमण, ६ दौड़ कर, १० ढूंढते हैं, ११ बहुत कहते हैं १६७
SR No.090008
Book TitleAdhyatma Panch Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal, Devendramuni Shastri
PublisherAntargat Shree Vitrag Vigyan Swadhyay Mandir Trust
Publication Year
Total Pages205
LanguageBraj
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, & Religion
File Size2 MB
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