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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २४९ सूत्रस्पर्शकनिर्युक्त्यनुगमनिरूपणम् ८६७ नोपन्यासः कृतः । अत एव सामायिकपदं नो सामायिकपदप भेदेनोपन्यस्तम् । तथा-सामायिकपदं ज्ञास्यते । तथा-सामायिकव्यतिरिक्तानां नारकतिर्यगाद्यर्थानां प्रतिपादकं यत्पदं तद् नो सामायिकपदं, तच्चापि ज्ञास्यते । सूत्रे समुच्चारिते एव स्वसमयादिपरिज्ञानं भवति, स्वसमयादिपरिज्ञानमेव सूत्रोच्चारणस्य फलं बोध्यमिति भावः। तस्मिन् सूत्रे उच्चारिते सति ततः केषांचिद् भगवतां-पूज्यमुनीनां यथोक्तनीत्या केचिदर्थाधिकारा अधिगता:परिज्ञाता भवन्ति । तथा-केषांचिद् भगवतां पूज्यमुनीनां क्षयोपशमवैचिच्यात केचित अर्थाधिकारा अनधिगता अपरिज्ञाता भवन्ति । ततस्तेषामनधिगतानाम् अर्थाधिकाराणाम् अधिगमनाथ परिज्ञानाय पदेन पदं वर्णयिष्यामि= पदों का भिन्नरूप से उपादान किया गया है। इसीलिये सामायिकपद तथा नो सामाषिक पद ये दोनों पद भी भिन्नरूप से उपन्यस्त किये गये हैं। सामायिक से व्यतिरिक्त नारक, तियर आदि अर्थों का प्रतिपादक जो पद हैं वह नो सामायिक पद है। सूत्र के समुच्चरित होने पर ही स्वसमयादि का परिज्ञान होता है, इसलिये स्वसमयादि का परिज्ञान ही सूत्रोच्चारण का फल है ऐसा जानना चाहिये। (तओ तम्मि उच्चारिए समाणे केसिं च णं भगवंताणं केइ अस्थाहिगारा अहिगया भवंति) तथा-उस सूत्र के समुच्चारित होने पर कितनेक भगवंत-पूज्यमुनियों को अधिकार अधिगत-परिज्ञात हो जाते हैं। (केह अस्थाहिगारा अणहिया भवंति) तथा कितनेक अर्थाधिकार, क्षयोपशम की विचित्रता से अनधिगत रहते हैं । (तओ तेसिं अणहि गयाणं अहिगमणहाए पयं पएणं वन्नहस्सामि) इसलिये उन मुनिजनों કરવા માટે અથવા શિષ્યજનેની બુદ્ધિની વિશદતા માટે એ બને પદનું નિરૂપમાં ઉપાદન કરવામાં આવેલ છે. એથી જ સામાયિક પદ તથા ને સામાયિક પદ એ બન્ને પદે પણ ભિન્ન રૂપથી ઉપન્યાસ્ત કરવામાં આવેલ છે. સામાયિકથી વ્યતિરિક્ત, નારક, તિર્યગૂ વગેરે અર્થોના પ્રતિપાદક જે પશે છે, તે સામાયિક પદ છે. સૂત્રના સમુચ્ચારણથી જ સ્વસમયાદિકનું પરિજ્ઞાન થાય છે, એથી સ્વ સમયાદિનું પરિજ્ઞાન જ સૂત્રોચ્ચારણનું ફળ છે. એમ नसे. (तओ तम्मि उच्चारिए समाणे केसिं पण भगवंताणं केइ अत्याहिंगरा। अहिगया भति) तथा सूचना सभुश्यारथा डेटमा मत -धूल्यमुनिमान। अर्थाधिार-मधित-परिज्ञान-28 जय छ (केइ अत्थाहि गारा अणहिगया भवंति) तथा ४८ अर्थापि, क्षयोपशमनी, वियताया सनधिशत छ. (तओ तेसिं अणहिगयाण अहिगमणद्वाए पयं पएणं वन्नड
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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