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________________ अनुयोगन्द्रका टीका सुत्र २४७ सूत्रालापक निष्पनं निरूपणम् आगमे यदस्य निक्षेपः क्रियते तदपेक्षयाऽत्र से निक्षेतव्यः, अस्य प्रथममाप्तत्वादिति चेदाह सूत्रानुगमे एव सूत्रनुच्चारयिष्यते, नवात्रोच्चार्यते, सूत्रोच्चारणमन्तरेण हि तदापकानां निक्षेपस्यानुचितत्वादिति । ननुं यद्येवं तर्हि किमर्थं सूत्रालापक निक्षेपस्यात्रोपन्यासः कृतः । इति चेदाह - निक्षेप साम्यमात्राचदुपन्यासो बोध्य इति । इत्थं निक्षेपलक्षणं द्वितीयमनुयोगद्वार प्ररूपितमिति सूचयितुमाह स एष निक्षेप इति सु. २४७॥ चाहिये । तथा यहां पर निक्षिप्त हुआ ही जैसा मानना चाहिये । इस. लिये यहां उसका निक्षेप नहीं करते हैं, वहाँ पर ही उसका निक्षेप करेगा। शंका--आगम में जो इसका निक्षेप किया गया है, सो उसकी अपेक्षा लेकर यहीं पर उसका विक्षेप करना चाहिये । क्योंकि अनुगमकी अपेक्षा यह प्रथम प्राप्त है ? ७७३ T उत्तर -- अनुगम के वर्णन में सूत्रानुगम और नियुक्तयनुगम ऐसे दो भेद कहे हैं - सो जो सूत्रानुगम है उसमें ही सूत्रका उच्चारण होगा - यहां नहीं । इसलिये सूत्र के उच्चारण हुए विना उसके आलापकों का निक्षेपकरना अनुचित है । शंका- यदि यही बात है तो फिर क्यों यहां सूत्रालापकनिक्षेप का उपन्यास किया ? उत्तर -- निक्षेप की समानता मात्र को लेकर उसका यहाँ उपन्यास किया है, ऐसा जानना चाहिये । (से तं निक्खेवे ) इस प्रकार निक्षेपरूप अनुयोग द्वार प्ररूपित हुआ | ० २४७ ॥ ત્યાં નિક્ષિપ્ત થયેલ જેવું જ માનવુ જોઈએ. એથી અહી તેના નિક્ષેપ કરતા નથી, ત્યાં જ તેને નિક્ષેપ કરાશે. शाः--आगभभां ने माना निक्षेप उरवामां भाग्यो है, तो तेनी અપેક્ષાએ અહી જ તેના નિક્ષેપ કરી લેવા જોઈએ, કેમકે અનુગમની અપેક્ષાએ આ પ્રથમ પ્રાપ્ત છે? ઉત્તર:--અનુગમના વનમાં સૂત્રાનુગમ અને નિ કત્યાનુગમ એવા બે ભેદો કહેવામાં આવેલ છે. આમાં જે સૂત્રાનુગમ છે તેમાં સુત્રનું* ઉચ્ચારણ થશે, અહીં નહિ. એથી સૂત્રેાચ્ચારણ વિના આલાપકને निक्षेप री ते योग्य नथी. શકા!--ો એવું જ છે તે પછી અહી' સૂત્રાલાપકનિક્ષેપના ઉપન્યાસ શા માટે કરવામાં આવેલ છે. ઉત્તર:--નિક્ષેપની સમાનતા માત્રથી જ મહી' તેના ઉપન્યાસ કરવામાં मावेस छे. गाम लगी सेवु लेथे. (से त' निक्खेवे ) मा प्रभाले निक्षेप રૂપ દ્વિતીય અનુચગદ્વારનુ નિરૂપશુ થયુ છે. ા સૂત્ર-૨૪૭ ॥
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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