SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 770
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २४५ क्षपणानिरूपणम् ७५७ टोका--'से किं तं' इत्यादि 'अथ का साक्षपणा?' इति शिष्यप्रश्नः । उत्तरयति-क्षपणा अपचयो निर्जरा वा। सा नामक्षपणा स्थापनाक्षपणा द्रव्यक्षपणा भावक्षपणेति चतुर्विधा । चतुविधानापासां भेदाभेदसहितानां व्याख्या पूर्ववत् स्वयं बोध्या। इत्थं सभेदा क्षपणा निरूपितेति मृचयितुमाह-सपा क्षपणेति । इत्थं च भेदोपभेद सहित समस्त बोधनिष्पन्नो निक्षेपः प्ररूपित इति सूचयितुमाह-स एष ओघनिष्पन्न इति । अक्षी. णादिषु त्रिष्वपि भावे विचार्यमाणेऽध्ययनमेवाऽऽयोजनीयमिति ॥६०२४५॥ अब सूत्रकार क्षपणा का निरूपण करते है-- 'से कि तं झवणा' इत्यादि। शब्दार्थ--(से कि तं ज्झवणा ?) हे भदन्त ! पूर्वप्रक्रान्तक्षपणा का क्या स्वरूप है ? । (झवणा) । उत्तर--'क्षपणा' नाम 'अपचय' अथवा 'निर्जरा' का है। यह क्षपणा (चविहा पण्णता) चार प्रकार की कही गई है। (तं जहा) जैसे-(नामज्शवणा, ठवणझणा, दव्यजावणा, भावझवणा) नामक्षपणा, स्थापना क्षपणा, द्रव्यक्षपणा, और भावक्षपणा । भेद प्रभेद सहित इन चारों की व्याख्या पहिले के समान जाननी चाहिये । इस प्रकार से निक्षेप के भेद ओघनिष्पन्न के भेद स्वरूप, क्षपणा का वर्णन जानना चाहिये। इस वर्णन के समाप्त हो जाने पर भेद प्रभेद सहित समस्त ओघनिष्पन्न निक्षेप का वर्णन समास हो जाता है। अक्षीण, आय और क्षपणा इनका स्वरूप जय अच्छी प्रकार से विचार लिया હવે સૂત્રકાર ક્ષપણાનું નિરૂપણ કરે છે. 'से कि त उझवणा ?' इत्यादि । सहाय-से कि त झवणा) RE! पू न्त क्षपणा ५१३५ छ? (जावणा) '१५' नाम 'अ५य' भया नि ' . मा क्ष५। (चेउन्विहा पण्णता) या२ रनी अवाम माली छे (जहा) २म (नामज्ञवणा, उत्रणमावणा, दधज्झरणा, भावझवणा).नाम क्ष, સ્થાપના ક્ષપણા, દ્રવ્ય ક્ષપણું અને ભાવ ક્ષપણા ભેદ પ્રભેદ સહિત આ ચારચારની વ્યાખ્યા પહેલાં જેવી જ સમજવી જોઈએ. આ પ્રમાણે નિક્ષેપના ભેદ, ઘનિષજ્ઞના ભેદ વરૂમ, ક્ષપણાનું વર્ણન જાણવું જોઈએ. આ વર્ણન પૂરું થવાથી લેહ, પ્રભેદ સહિત સમસ્ત ઘનિષ્પન્ન નિક્ષેપણું વર્ણન સમાસ થઈ જાય છે. અક્ષીણુ, આય, અને શપણ આ બધાનું સવરપ જયારે સારી રીતે
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy