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________________ १० अनुयोगद्वारसूत्रे लात्मके घटे - ग्रीवा वर्त्तते सा च आत्मभावेऽपि वर्तते । ननु 'कुण्डे बदराणि' इति अंत्परसमवतारस्योदाहरणं प्रदर्शितम्, इदमपि तदुभयसमवतारस्यैवोदाहरणं तुमर्हति कुण्डे वर्तमानानां बदराणां स्वात्मन्यपि वर्तमानत्वादिति चेत्, श्रृणु, अत्र स्वात्मवृत्तेर्विवक्षामकृत्यैव मुपन्यासः कृतः । वस्तुतस्तु द्विविध एवं समववारो युक्तः, अत एव सूत्रकारः स्त्रयमाह - ' अहवा' इत्यादि । अथवा - ज्ञायक शरीर भव्य शरीरव्यतिरिक्तो द्रव्यसमवतारो द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा - आत्मसम - वतारः तदुभयसमत्रवारथेति । पूर्वोक्तरीत्या परसंमवतारस्यासंभवितामुपलक्ष्य है और वह स्तम्भ अपने रूप में भी रहता है । अथवा जैसे बुन्धोदरकपालरूप घट में ग्रीवा रहती है और वह ग्रीवा आत्मभाव में भी रहती है। * शंका- 'कुण्डे बदराणि' ऐसा जो उदाहरण आपने परसमवतार का दिया है, सो यह उदाहरण तदुभयसमवतार का ही होना चाहिये । क्योंकि जिस प्रकार वे कुंडमे रहते हैं, उसी प्रकार से वे अपने आत्म भाव में भी रहते हैं ? उत्तर- सुन, यह जो दृष्टांत परसमवतार का दिया गया वैसे यदि विचार किया जावे ते समवतार दो प्रकार का ही होना चाहिये। इसी बात को सूत्रकारने निर्दिष्ट करने के लिये ( अहवा जय सरीर भविसरवरिश्ते समोयारे दुविद्दे पण्णत्ते) ऐसा कहा है। इसमें वे यह कह रहे हैं कि ज्ञापकशरीर भव्यशरीर से व्यतिरिक्त जो द्रव्य समवतार है वह दो प्रकार का प्रज्ञप्त हुआ है । (तं जहा) जैसे - ( आयसमोयरे य तदुभयसमोयारे य ) एक સ્વરૂપમાં પણ રહે છે. અથવા જેમ યુનેદર-કપાલરૂપ ઘટમાં શ્રીવા રહે છે અને તે ગ્રીવા આત્મભાવમાં પણ રહે છે. श'--'कुण्डे बदराणि मे ने उहाहर तभे परसभवतास्तुं आपेस छे, તે. આ ઉદાહરણ તદ્રુમય સમવતારનુ'જ હાવું જોઈ એ. કેમકે જેમ કુંડમાં તે રહે છે. તેમજ તે પેાતાના આત્મભાવમાં પણ રહે છે ? ઉત્તર--સાંભળે-આ જે દૃષ્ટાન્ત પરસમવતાર વિષે આપેલ છે, તેમાં સ્વાત્મવૃત્તિની વિક્ષા કરવામાં આવી નથી. આમ જે વિચાર કરવામાં આવે તે સમવતારના એ પ્રકારા જ હાવા જોઈએ. એ જ વાતને સૂત્રકારે નિર્દિષ્ટ કરવા भाटे (अत्रा जाणय सरीरभत्रिय सरीरवत्तेि दव्वधमोयारे दुषिछे पण्णत्ते) आम छु छे. सभां तेथे या प्रभा ही रह्या छे ! ज्ञायશરીર સભ્યશરીરથી વ્યતિરિકત જે દ્રવ્ય સમવત ૨ છે, તે એ પ્રકારને अज्ञात ग्रेस छे. (तं जहा) प्रेम है (भायखमोयारे य तदुभयसमोयारे य)
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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