SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 72
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६१ . अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १८५ भावप्रमाणनिरूपणम् तस्पुरुषे हि उत्तरपदार्थमाधान्यं बोध्यम् । तथा-अनुग्रामम्-ग्रामस्य पचादिति विग्रहः । 'अव्ययं विभक्तिः' इत्यादिनाऽव्ययीभावसमासः । एवम् 'अनुनदिकम्' इत्याद्यपि बोध्यम् । अव्ययीभावे हि पूर्वपदार्थक्ष्य प्राधान्यं बोध्यम् । तथा-सरूपयोद्वयोः पदयोः सरूपाणां -बहूनां वा पदानां समासे "सरूपाणामेकशेषएकविभक्तों इत्यनेनैकमवशिष्यान्यपदलोपे सति अवशिष्यमाणं पदं द्वित्वस्य बहुत्त्रस्य च वाचक भवति । तस्य द्विवचनान्तता बहुवचनान्तता वा भवति । यथा-पुरुषश्च पुरुषश्च तीर्थ पर कौवे की तरह ग्राह्य अग्राह्य के विवेक से शुन्य होकर रहता है, वहं इस प्रकार से कहा जाता है। ये तीर्थ कोक आदि उदाहरण तत्पुरुष समास के हैं । तत्पुरुष समास में उत्तर पदार्थ की प्रधानता रहती है। (सें किं तं अन्बई भावे) हे भदन्त ! अव्ययी भाव समास क्या है ? ... उत्तर-(अव्वई भावे) अव्ययीभाव समास इस प्रकार से होता है-(गामस्स पच्छा अणुगामं, एवं अणुणइयं, अणुफरिसं, अणु चरियं) ग्रामस्य पश्चात्-अनुग्रामम् , इसी प्रकार से अनुनादिकम् , अनु. स्पर्शम् , अनुचरितम् में जानना चाहिये। (से तं अव्वई भावे समासे) इस प्रकार यह अव्ययीभाव समास है। (सें कितं एगसेसे ?) है भदन्त ! एकशेष समास क्या है ? . उत्तर-(एगसेसे) एक शेष समास इस प्रकार से है-(जहा एग्गो पुरिसो तहा बहवे पुरिसा जहा यहवे पुरिसा तहा एग्गो मुरिसो, जहा एगो करिसावणो तहा बहवे करिसावणा, जहा बहवे करिसावणा, છે. જે વ્યક્તિ તીર્થક્ષેત્રમાં કાગડાની જેમ પ્રાણ-અગ્રાહના વિવેકથી રહિત થઈને રહે છે, તેને આ પ્રમાણે કહેવામાં આવે છે. આ તીર્થના વગર ઉદાહરણ તપુરૂષના છે. તપુરૂષ સમાસમાં ઉત્તર પદાર્થની પ્રધાનતા રહે છે. (से कि त अव्वई भावे) ३ त ! अन्यथा मा समास वाया ... उत्तर-(अव्बई भावे) अव्ययीभाव समास 20 प्रभारी -(गामस्स पच्छा अणुगामं एवं अणुणइयं अणुफरिस, अणुचरियं) प्रामस्य पश्चात् अनुमामम, प्रभारी भीon GisrQ। मेवी रीत छे-अनुनदिकम्, अनुस्पर्शम्, अनुचरितम्, (खे त अव्वई भावे समासे) मा प्रभारी मा अध्ययी नाव समास छ. (से किं त एगसेसे १) महन्त ! शेष सभास होने वाय? ... उत्तर-(एगसेसे) २४शेष संभासा प्रभाव छे. (जहा एगो पुरिसों तहा बहवे पुरिसा जहा बहुवे पुरिमा तहा एगो पुरिसो, जहा एगो करिमावणों तहा वह कारिसावणा, जहा बहवे कारीसावणा, तहा, एगो करिसावणो. • "
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy