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________________ ७०४ D अनुयोगहारसूत्र टीका-'से कितइत्यादि अथ कोऽसौ अर्थाधिकारः ? इति शिष्य प्रश्नः । उत्तरयति-अर्थाधिकारः यो यस्य सामायिकाघध्ययनस्य अर्याधिकार: अर्थविषयोऽधिकारः स बोध्या तमेवाह-तद्यथा-सावधयोगविरतिरित्यादि। अस्या गाथाया अर्थोऽत्रैवागमे पञ्चाशचमे सूत्रे व्याख्यातस्तत एव बोध्या। वक्तव्यतार्थाधिकारयोस्कर विशेष:-अर्थाधिकारो हि अध्ययनस्यादिपदादारभ्य अन्तपदावधि सकलपदेश नुवर्तते, पुद्गलास्तिकाये प्रतिपरमाणु मूर्तत्ववत् । वक्तव्यता तु देशादि नियतेति प्रकृतमुपसंहरबाह स एषोऽर्थाधिकार इति ॥५० २३९॥ _अथ उपक्रमस्य षष्ठं द्वारं समवतार निरूपयति मूलम्-से किं तं समोयारे? समोयारे-छविहे पण्णत्ते तं जहा-णामसमोयारे ठवणासमोयारे दव्वसमोयारे खेत्तसमो. यारे कालसमोयारे भावसमोयारे। नामठवणाओ पुवं वणि. याओ जाव से तं भवियसरीरदव्वसमोयारे । से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्वसमोयारे? जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्वसमायारे-तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-आयसमोयारे अर्थ इसी आगम में ५८ वें सूत्र में स्पष्ट किया जा चुका है, अतः वही से जान लेना चाहिये। वक्तव्यता और अर्थाधिकार में यह भेद है कि अर्थाधिकार जो होता है, वह अध्ययन के आदि पद से लगाकर अन्तिम पदतक संवन्धित रहता है। जैसे पुद्गलास्तिकाय में प्रतिपरमाणु में मूतत्व रहता है। और जो वक्तव्यता होती है वह देशादिनियत होती है । (से तं अस्थाहिगारे) इस प्रकार यह अर्थाधिकार विषयक कथन है ।।सू० २३९॥ गणधारणा चेव) मा आयाना स स भागममा ५८ मां सूत्रमा स्पष्ट કરવામાં આવેલ છે. તેથી જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાંથી જાણી લે વકતવ્યતા અને અર્થાધિકારમાં આ તફાવત છે કે અર્થાધિકાર જે હોય છે. તે અધ્યયનના આદિ પદથી માંડીને અંતિમ પદ સુધી સંબંધિત રહે છે. જેમ કે “પુદગલાસ્તિકામાં પ્રતિ પરમાણુમાં મૂર્તત્વ રહે છે. અને જે વકતવ્યતા હોય છે, a शानियत डाय छे. (से तं मत्थाहिगारे) प्रमाणे भा अधिकार વિષયક કથન છે. એ સૂત્ર ૨૩
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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