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________________ अनुयोगवन्दिका टीका सूत्र २३० संख्याप्रमाणनिरूपणम् मासङ्गभयाग्नेच्छति, अत एतमयमते बद्घायुष्काभिमुचनामगोत्रेति शङ्कद्वयमितिका तथा-शब्दसमभिरूद्वैवंभूताख्यास्त्रयः शब्दनया ऋजुमूत्रापेक्ष पागि विशुद्धत्वात बदायुष्कमपि अतिव्यवहितं मन्यते, अतोऽतिप्रसङ्गनिवृत्यर्थमभिमुखनामगोत्रमेकमेव शङ्खमिच्छन्ति । प्रकृतमुपसंहरन्नाह-स एष ज्ञायकशरीरमव्यशरीर व्यतिरिक्तो दव्यशक इति । इत्थं नो आगमतो द्रव्यशङ्खस्य भेदयत्रयमपि निरूपितमिति सूच, यितमाह-स एष नो आगमतो द्रव्यश इति । इत्थं सभेदो द्रव्यशः मरूपित इति प्रचयितुमाह-स एष द्रव्यशङ्ख इति ।मु० २३०॥ . . पर्याय को ही ग्रहण करता है । इसलिये एकभविक ख को नया भाव शंख के प्रति अतिव्यवहित होने के कारण अतिप्रसंग के माय से स्वीकार नहीं करता है । पद्धायुष्क और अभिमुख नाम गोत्र इखि ये भाव के प्रति अतिव्यवहित नहीं हैं, किन्तु समीर हैं। इसलिये इन्हें मानता है। (तिणि सद्दनया अभिमुहनामगोत्तं संखं इच्छंति), शब्द समंभिरूढ ओर एवंभूत ये तीन नय अभिमुख नामगोत्र शंख, मानते हैं-दो को यहीं । ये नय ऋजुमूत्र नय की अपेक्षा..भी. विशद्ध होते हैं-इसलिये इनकी दृष्टि में बद्धायुष्क शंख भी भाष शंख के प्रति अति व्यवहित हैं-सिर्फ एक अभिमुखनाम गोत्र शेख नही, इसलिये इसे ही ये शंख मानते हैं । (से तं जाणयसरीरभषियनीरवडरित्तादधसंखा-सेत नो आगमओदव्वसंखा-सेतं दधसखा' प्रकार से ज्ञायकशरीर भव्यशरीरव्यतिरिक्तद्रव्यशंखों के જ છે એથી એકભાવિકશખને આ નય ભાવશંખ પ્રત્યે અતિ અવહિત હવા બદલ અતિ પ્રસંગના ભયથી સ્વીકાર કરતું નથી. બદ્ધાયુકે 2 અભિમુખનામગોત્ર શંખ એ ભાવશંખની પ્રત્યે અતિવ્યવહિત की पत सभी५ मेथी मेमन माने छे...(तिण्णि सहनया अभिमहत बामगोतं सख इच्छंति) श, समलि३० मन वसूत सा जो नया અભિમખ નામ ગોત્ર શંખને માને છે. બેને નહિ. આ ન ઋજુ સત્ર તપની અપેક્ષા પણ વિશુદ્ધ હોય છે. એટલા માટે એમની દૃષ્ટિએ મહાયુધ્ધ શખ પણ ભાવ શંખની પ્રત્યે અતિવ્યવહિત હોય છે. ફક્ત એક અભિગમ नाम मात्र नहि. मेथी UR 0 शो मान। . (सेत्तं जाणयसरीर भषिय सरीर वइरित्ता दव्यसंखा से तं नो आगम प्रो व्वसंखा-से तं दधसंखा) माले, જ્ઞાયફશરીર ભવ્ય શરીર વ્યતિરિક્ત દ્રવ્ય શંખમાં સ્વરૂપનું આ કથન છે ને
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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