SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 628
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २३० संख्याप्रमाणनिरूपणम् स्कथिकम् , स्थापना तु इत्वरिका वा यावत्कथिका भवति । नामसंख्यास्थापनासंख्याविषये विशेषभावना नामावश्यकस्थापनावश्यकानुसारेण कर्तव्या। तथा द्रव्यशङ्खः आगमनोभागमभेदेन द्विविधः। तत्र नोआगमतो द्रव्यशस्विविधो ज्ञायकशरीरद्रव्यशङ्खः, भव्यशरीरद्रव्यशङ्खः, ज्ञायकशरीरमव्यशरीरव्यतिरिक्तो द्रव्यशश्व । अत्र आगमतो द्रव्यशङ्ख, नो आगमतो द्रव्यशङ्खस्याधभेदद्वयं च द्रव्यावश्यकस्येव विज्ञेयम् । तृतीयभेदस्य ततो विलक्षणत्वात ते वक्तुमुपक्रमते-'से उत्तर--(णाम ? आवकहिय, दवणा इत्तरिया वा होज्जा आवक हिया वा होज्जा) नाम यावत्कधिक होता है तथा स्थापना इस्वरिक भी होनी है और यावत् कथिक भी होती है । नाम संख्या एवं स्थापना संख्या इन दोनों के विषय का खुलाशा अर्थ और भेद नामआवश्यक और स्थापनाआवश्यक के अनुसार समझ लेना चाहिये । यह प्रकरण पीछे स्पष्ट लिखा जा चुका है। (से कि तं दव्यसंखा !) हे भदन्त ! द्रव्यशंख का क्या तात्पर्य है ? उत्तर-(दव्यसंखा दुविहा पण्णत्ता) द्रव्यशंख दो प्रकार का कहा गया है। (तं जहा) जैले (भागमो यनो आगमओ य जाव) आगम द्रव्य शंख और नो आगमद्रव्यशंख । इनमें नो आगम की अपेक्षा से यशंख तीन प्रकार का होता है-एक ज्ञायक शरीर द्रव्यशंख, दूम। भाप शरीर द्रव्य शंख, और तीसरा ज्ञायकशरीर भव्यशरीर व्यति. रिक्त द्रव्य शंख । आगम की अपेक्षा से द्रव्यशंख का और नोआगम की अपेक्षा से द्रव्यशंख के प्रथम और द्वितीय भेद का स्वरूप द्रव्या शा-(णामठवणाणं को पइविसेसो) नाम सन स्थापनामाशातशत छ ? उत्तर--णाम आवकहियं, ठरणा इत्तरिया वा होज्जा आकहिया वा होज्जा) नाम. यावथित डाय छ, तम । स्थापना २४ प डाय छे. અને યાવત કથિત પણ હોય છે. નામસંખ્યા અને સ્થાપના સંખ્યા આ બન્ને વિષય વિષે અર્થો અને ભેદ નામ આવશ્યક તેમજ સ્થાપના આવશ્યક મુજબ સમજી લેવું જોઈએ. આ પ્રકરણ વિષે પહેલાં સ્પષ્ટતા કરવામાં આવી છે. તેણે कित' दव्वसंखा ?) Bहत! द्रव्य मर्नु शुतात्पर्य छ । Gत्तर-(दव्वसंखा दुविहा पण्णत्ता) द्रव्य ना मे रे। डाय छे. ( जहा) २ (आगमओ य नो भागमओ य जाव) भाद्रव्य शप અને નોઆગમ દ્રવ્યશખ આમાં આગમની અપેક્ષાએ દ્રવ્યશનના ત્રણ પ્રકારો હોય છે. જ્ઞાયક દ્રવ્યશખ, ભવ્ય શરીર દ્રવ્યશંખ અને જ્ઞાયક શરીર ભવ્ય શરીર યતિરિકત દ્રવ્યશખ. આગમની અપેક્ષાએ દ્રવ્ય શંખના પ્રથમ અને દ્વિતીય ભેદનું સ્વરૂપ દ્રષાવશ્યકમાં પ્રતિપાદિત થયેલ આ પ્રકારની જેમ જ સમજવું
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy