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________________ ६६८. अनुयोगद्वारसूत्रे , • अयं भावः - अर्थोपलब्धिस्तु शब्दादेव भवति, पञ्चविधः प्रदेश इति कथनेन प्रत्येकद्रव्यपदेशस्य पञ्चविधत्वमापद्यते इति । एवं च तत्र मतेन पञ्चविंशतिविधः प्रदेश स्यात् तस्मात् मा भग - पञ्चविधः प्रदेशः, अपि तु भक्तव्यः भजनीयः प्रदेश इति वक्तव्यम् । किपद्भिर्विभागैर्भक्तव्यः स्यात् ? इत्याह- स्याद् धर्मपदेशः, स्यादधर्मप्रदेशः स्यादाकाशम देशः स्याज्जीवप्रदेश, स्थात् स्कन्धमदेश इति । पएसेा भवइ) इस प्रकार कहने वाले व्यवहार से जुलूत्रनय ने कहा जा तुम पंचविधः प्रदेश: ' ऐसा कहते हो तो वह बनता नहीं है, क्योंकि यदि स्वत्संमत पांच प्रकार का प्रदेश माना जावे तो धर्मास्तिकायादिकों में से एक एक अस्तिकाय का प्रदेश पांच पांच प्रकार का हो जायगा । इसका तात्पर्य यह है कि- 'अर्थ की उपलब्धि शब्द से ही होती है । जब 'पंचविधः प्रदेश:' ऐसा कहा जावेगा - तब इस कथन से प्रत्येक द्रव्य प्रदेश में पंचविधता स्वतः प्रतिभासित होगी ही । इस प्रकार तुम्हारे मन्तव्यानुसार 'पंचविंशतिविधः प्रदेशः 'ऐसा 'पंचविधः प्रदेश:' का वाक्यार्थ होगा। (तं) इसलिये (मा भणाहि ) मत कहो कि ( पंचविहो पएसो) 'पंचविधः प्रदेशः ' ऐसा ( भणाहि ) किन्तु ऐसा कहो (भयत्रो परसो) कि प्रदेश भजनीय है। (सिय धम्मपएसो, सिय अधम्मपरसो, सिय आगासपएसो, सिप जीवपएसो, सिय खंध पएसी) धर्मप्रदेश भजनीय है, अधर्मप्रदेश भजनीय है, आकाशप्रदेश भजनीय है, जीव प्रदेश भजनीय है, स्कंत्र प्रदेश भजनीय है । तात्पर्य सविदो परसो भवइ) या प्रमाये उडेनारा व्यवहारने अनुसूत्रनये अधु ले तमे “पंचविधः प्रदेशः " साम કહેશે. તા તે ચૈગ્ય નથી. ક્રમકે ને સ્વસંમત પાંચ પ્રકારના પ્રદેશ માનવામાં આવે તે ધર્માસ્તિકાયાક્રિકોમાંથી એક એક અસ્તિકાયના પ્રદેશ પાંચ પાંચ પ્રકરના થઇ જશે, આનુ' તાત્પય या प्रमाणे छे ! 'अर्थनी उपलब्धि शब्दथी न थाय छे. न्यारे “पंचविधः प्रदेशः " भेषी रीते प्रवामां आव त्यारे मां प्रथनथी हरे हरे द्रव्य પ્રદેશમાં પવિધતા સ્ત્રયમૈત્ર શાસિત થઇ જશે જ, આ પ્રમાણે તમારા “भत भु४ “पंचविशतिविधः प्रदेशः येथे ' पंचविधः प्रदेशः "नो वास्यार्थ थशे (तं) भेटला भाटे (मा भणाहि) साम न डे है (पंचविहो पएसो) “पंचविधः प्रदेशः (भ्रणाहि ) परंतु आम हो ( भइयत्रो पएम्रो) महेश लभनीय छे. (सिय धम्मपसो सित्र अधम्मपदस्रो, खिय आगासपरसो, सिय जीवप्रएसो, सियखं त्रपठो) धर्म प्रदेश लनीय छे, अधर्म प्रदेश लगनीय छे, आश પ્રદેશ ભજનીય છે, જીવ પ્રદેશ ભજનીય છે, સ્કંધ પ્રદેશ ભજનીય છે, આ 040 -
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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