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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र १८३ स्थापनाप्रमाणनिरूपणम् तत्तन्नक्षत्रस्याधिष्ठाता प्रजापत्यादिः स स देवो बोध्यः । तत्तन्नाम्नाऽपि नाम: स्थापनं क्रियते । तत्तु माजापतिका प्रजापतिदत्त इत्यादिरूपेण स्वयमभ्यूह्यम् । पत्र देवतानामानि संग्रहीतुं सूत्रकारो द्वे-संग्रहणी गाथे माह-'अग्गिपयावइ ! इत्यादि । अनयोव्याख्या स्पष्टा । इत्थं देवतानाम बोध्यम् । एतदेव दर्शयतिक 'तदेतद् देवतानाम' इत्युपसंहारवाक्येनेति । अथ कुलनाम दर्शयति-यो हि यस्मिन् कुले जातस्तत्कुलनाम्ना तस्य नामस्थापनं चेत् क्रियते तदा कुलनामरूप रक्षित। (एवं सव्वनक्खत्त देवया नाम भाणियव्या) इसी प्रकार से और भी अवशिष्ट देवताओं को आश्रित करके उनके नाम उनमें जन्म होने के कारण स्थापित करलेना चाहिये । जैसे-रोहिणी नक्षत्र का अधिष्ठाता प्रजापति देवना है। सो जो इस नक्षत्र में उत्पन्न होता है उसका नामस्थापन उस नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता के नाम: को लेकर दिया जाता है-यथा-पाजापतिक, प्रजापति दत्त इत्यादि यहां देवतानामों को संग्रह करने के लिये सूत्रकार ने ये दो .संग्रहणीकी गाथाएँ कहीं हैं-(अग्गिपयावई सोमे, रुदो अदिती विहस्सई सप्पे) अग्नि, प्रजापति, सोम, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, स (पितिभगअज्जम, सविया, तट्ठा वाऊथ इंदरगी) पिता, भग अर्यमा, सविता, स्वष्टा, वायु, इन्द्राग्नि, (मित्तो बंदो निरई आऊ विस्सो यम विण्हया) मित्र इन्छनिति, अम्भ, विश्व, ब्रह्मा, विष्णु, (वसुवरुणअय विवद्धी, पूसे मास जमे थेव) वसु, वरुण, अज, विवद्धि, पूषा, अश्व यम। (से तं देव. रक्खिए) अनिक्षित, (एवं सम्वनक्खत्तदेवया नाम भाणियव्या). प्रभाव બીજા પણું સર્વ દેવતાઓના આધારે તેમના નામે તેમનામાં જન્મ પ્રાપ્ત કરવા બદલ સ્થાપિત કરી લેવાં જેમ કે રોહિણી નક્ષત્રને અધિષ્ઠાતા પ્રજાપતિ દેવ છે. તો આ નક્ષત્રમાં જે ઉત્પન્ન થયો હોય છે, તેનું નામ તે નક્ષત્રના અધિષ્ઠાતા દેવતાના નામના આધારે રાખવામાં આવે છે. જેમ કે પ્રાજાપતિક, પ્રજાપતિદત્ત વગેરે અહીં દેવતાઓના નામોના સંગ્રહ માટે સૂત્રકારે બે सहानी गाथासासी छे. (अग्गिपयावई सोमें, रुहो अदिती विहस्सई सन्के) भनिन, पति, साम, मु, महत, पति, सा (पित्ति भगअंजम, सविया, तदा पाऊय इंदग्गी) पिal, स मयमा, सविता, el, वायु, -NAGA (मित्तो इंदो निरई आऊ विस्सो य बंभ विव्हया) भित्र, .., नित, 44, विश्व, ब्रह्मा, विY (वसु वरुण, अय विषद्धी पूसे आसे जमे चेव) १४, १३, भा, विद्धि, Yषा, १११, यम (से तं देवयाणामे) अ०७
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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