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________________ ४८ अनुयोगद्वारसूत्र नक्षत्रक्रममाश्रिया पाठो बोध्या, अतो नास्ति दोष इति । एनानि कृत्तिकादी. न्यष्टाविंशतिनक्षत्राणि अग्न्याधष्टाविंशतिदेवताभिरधिष्ठितानि, अतः कश्चित् कृत्तिकाधन्यतमनक्षत्रजातस्य तन्नक्षत्राधिष्ठातुरग्न्यायन्यतमस्य नामाश्रित्य नामस्थापनं करोति, तदर्शयितुमाह-'अथ किं तद देवतानाम' इत्यादि । तत्र देवता. नाम-अग्निदेवतासु जात आग्निकः, अग्निदत्त इत्यादि बोध्यम् । एवं रोहिण्यादि हैं उस समय कृत्तिका रोहिणी इत्यादि कम ही देखा जाता है। इस लिये इस प्रकार के नक्षत्र क्रम को आश्रित करके पाठ विन्यास में कोई दोष नहीं है। (सेसं नक्षत्सनामे:) इस प्रकार यह नक्षत्र नाम है ये कत्तिका आदि २८ नक्षत्र अग्नि आदि २८ देवताओं से अधिष्ठित है। इसलिये यदि कोई इन कृत्ति का आदि किसी एक नक्षत्र में उत्पन्न होता है तो उसका नामस्थापन उस नक्षत्र के अधिष्ठायक अग्नि आदि किसी एक देवता के नाम को लेकर किया जाता है-इसी बात को सुत्रकार यो दिखलाते हैं-(से कि तं देवयाणामे) हे भदन्त । वह देवता नाम क्या है-अर्थात् देवताओं को आश्रित करके जो नामस्थापित किया जाता है, वह कैसा होता है ? ' . उत्तर-(देवयाणामे) वह देवतानाम इस प्रकार से है-(अग्गि देव. पा.जाए, अग्गिए) क्यों कि, वह अग्निदेवता में उत्पन्न हुआ है लिये थे.आग्निक (अग्गिदिण्णे) अग्निदत्त (भग्गिसम्मे) अग्निशर्मा अग्निधम्मे) अग्निधर्म (अग्गिदेवे) अग्निदेव (अग्गिरक्खिए) अग्नि"વામાં આવે છે, તે વખતે કૃતિકા રહિણી વગેરે ક્રમ જ જોવામાં આવે છે, શથી આ જાતના નક્ષત્રક્રમને આધારભૂત માનીને પાઠવિન્યાસ કરવામાં આવે aiggle न याय (से तं नवखत्तनामे) ni प्रमाणे या नक्षत्राना ઠા છે. આ કૃતિકા વગેરે ૨૮ નક્ષત્ર અગ્નિ વગેરે ૨૮ દેવતાઓથી અધિબત છે. એથી જે કોઈ આ કૃતિકા વગેરે કઈ એક નક્ષત્રમાં ઉત્પન્ન થાય છે તેનું નામ તે નક્ષત્રના અધિષ્ઠાયક અગ્નિ વગેરે કઈ એક દેવતાના નામ શ્રી રાખવામાં આવે છે. એજ વાતને સત્રકાર આ પ્રમાણે સ્પષ્ટ કહે છે. तं देवयाणामे) Bird! Agai नाम श१ भेटवताના આધારે જે નામે સ્થાપિત કરવામાં આવે છે તે કેવાં હોય છે? " त२-(वयाणामे). Ti नाममा प्रमाणे छ. (अग्गि देवयाहिं जाएं, ને કેમકે અગ્નિ દેવતામાં ઉત્પન્ન થયેલ છે. તેથી તે આગ્નિક हणे) हत्त, (अग्गिसम्मे) निशा, (अगिधम्मे) नियम, जिनदेव, (अगिधासे) SEEN (अग्गिसेणे) मनिसेन, (अग्गिा (अगिदेवे) AGAN
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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