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________________ ........ ..... . - ५८०. - अनुयोगद्वारसूत्रे अनेकानि गृहाणि, तेषु सर्वेषु त्वं बससि ?' विशुद्धतरको नैगमो भणति-देव. दत्तस्य गृहे वसामि । देवदत्तस्य गृहे अनेकाः कोष्ठकाः, तेषु सर्वेषु त्वं वससि ? विशुद्धतरको नैगमो भणति-गर्भगृहे वसामि । एवं विशुद्धस्य नैगमस्य वसन् । एवमेव व्यवहारस्यापि । संग्रहस्य संस्तारकसमारूढो क्सति । ऋजुत्रस्य कि (पाडलिपुत्ते अणेगाइं गिहाई-तेस्तु सम्वेसु तुवं वससि) पाटलिपुत्र में अनेक गृह हैं-सो क्या तुम उन सयों में रहते हो ? । (विसुद्धतराओ णेगमो अणइ) तव विशुद्धतर नैगमनय के मतानुकूल होकर उसने उत्तर दिया-(देवदत्तस्स घरे बसामि) देवदत्त के घर में रहता हूँ। (देवदत्तस्स घरे अणेगा कोहगा तेसु सन्वेसु तुवं वससि ?) पूछने वाले ने पुनः पूछा कि देवदत्त के घर में तो अनेक कोठे हैं, तो क्या तुम उन सबों में रहते हो ? (गबघरे वसामि) तब उसने कहा कि नहीं, मैं उन सब में नहीं रहता हूं । किन्तु वहां जो गर्भगृह है, उसमें रहता हूँ। (एवं विसुद्धस्त णेगमस्स वत्तमाणो) इस प्रकार विशुनर नैरमनय के मत के अनुसार यह गर्भ गृह में रहता हुआ ही 'वसति' इस रूप से व्यपदिष्ट होता है । तात्पर्य इस का यह है कि जिस गृहादि में सर्वदा निवासीरूप से विवक्षित होता यह यदि वहां उस समय में रह रहा है, तभी वह 'वहां रहता है। इस रूप से विशुद्धतर नैगमनय के मनानुसार व्यपदिष्ट हो सकता है । यदि e शवार अन ये हैं (पाडलिपुत्ते अणेगाइं गिहाई-वेसु सम्वेसु तुवं वससि) पाटलिपुत्रमा घgi घरे। माया छ. तो तमे त .स धराम निवास रे। छ। ? (विसुद्धतराओ णेगमो अणइ) त्यारे विशुद्धतर नशमनय भुरा त नाम आया है (देवदत्तस्स घरे वसामि) १६तना ३२ २९ छु. (देवदत्तस्स घरे अणेगा कोटगा तेसु सम्वेसु तुवं वससि !) પ્રશ્નકર્તાએ ફરીવાર પ્રશ્ન કર્યો કે દેવદેનના ઘરમાં તે ઘણા પ્રકે છે, તે तम. सब ठिोमा निवास ४३। छ। १ (गभघरे बसामि) त्यात જવાબ આપતાં કહ્યું કે, હું તે સર્વ પ્રકાષ્ઠામાં રહેતા નથી પણ ફક્ત તેના गलमा निवास छु. (एवं विसुद्धस्स गमस्त बसमाणों) मा प्रभाव विशुद्धतर नेशमनयना मत भुगम . ci २di or 'वसति' मा રૂપથી વ્યાદિષ્ટ થાય છે. તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે જે ગૃહાદિમાં સદા નિવાસ કરનારના રૂપમાં વિવક્ષિત થતાં જે તે ત્યાં જ રહેતું હોય તેજ આ “ત્યાં રહે છે. આ રૂપમાં વિશુદ્ધતર નૈગમનયના મત મુજબ વ્યપદિu
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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