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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २२३ उपमानप्रमाणनिरूपणम् 我 व्यर्थ एवेति चेदाह - यद्यपि सर्वसाधर्म्य मौपम्यं नास्ति, तथापि तेनैव तस्य# औपम्यं क्रिश्ते इति युक्त एव भेदोपन्यासः । अस्योदाहरणानि - अद्भिरईत्सश कृतमित्यादि । अयं भावः- अर्हद्भिर्यत्सर्वोत्तमं तीर्थमवर्त्तनादिकृतं तदर्द्धन्त एव कर्तुमर्हन्ति, नापरे इति । एवं चक्रार्त्तिना चक्रवर्त्तिसदृशं कृतमित्यादीनामपि प्राप्त होगा तब यह उपमान का तीसरा भेद ही नहीं बन सकेगा । इस प्रकार की शंका का उत्तर-( सर्वसाहम्मे ओवम्मे नस्थि तहा वि तेणेव तस्स ओवम्मं कीरह) इस सूत्रपाठ से दिया है । इसमें यह कहा गया है - 'कि यद्यपि दूसरे के साथ दूसरे की सर्व प्रकार से समानता नहीं मिलती है, यह बात सर्वथा सत्य है परन्तु फिर भी इसमें जो सर्वप्रकार से समानता प्रकट की गई हैं, उसका तात्पर्य यह है कि 'वह समानता उसी के साथ प्रकट की जाती है-दूसरे के साथ नहीं । जैसे- (अरिहंतेहिं अरिहंतसरिसं कथं, चक्कवहिणा चक्कवहिसरिसं - कयं बलदेवेण बलदेसरिसं कयं वासुदेवेण, वासुदेवसरिसं कयं साहुणा साहसरिसं कयं से तं) अतोने अर्हतों के समान किया, चक्रवर्ती चक्रवर्तियों के समान किया, बलदेव ने बलदेवों के समान किया वासुदेव ने वासुदेवों के समान किया, साधुने साधुत्रों के समान किया । इस कथन का तात्पर्य केवल इतना ही है कि-'अर्हतो ने जो सर्वोत्तमः तीर्थप्रवर्तन आदि कार्य किये हैं, उन्हें ओर कोई दूसरा नहीं कर ના ત્રીસે પ્રકાર જ અસ્તિત્વમાં આવી શકશે નહિ. આ જાતની શંકાના उत्तर (साहम्मे ओवम्मे नत्थि तहा वि वेणेव तरस्र ओवम्मं कोरइ) આ સૂત્રપાઠ વડે આપવામાં આવ્યા છે. આમાં આ પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યુ છે કે જો કે બીજાની સાથે ખીજાની સ` રીતે સમાનતા મળતી નથી, આ વાત સપૂર્ણ રીતે સાચી છે છતાંએ આમાં જે સર્વ પ્રકારથી સમાનતા પ્રકટ કરવામાં આવી છે, તેનું તાત્પ આ પ્રમાણે છે કે, તે સમાનતા તેની સાથે ४ अ४८ ४२वामां भावी हे बीलनी साथै नहि प्रेम में (अरिहंतेहि अरिहंतसरिसं कयं चक्कत्रट्टिणा चकत्र ट्टिसरिसं कयं बलदेवेण बलदेवसरिसं कथं, वासुदेवेण वासुदेवसरिसं कय, साहुणा साहु सरिसं कथं से त) भई ताथे ईन्तो वुः भ्यु, यवर्ती वर्तीयाना देवुभु, भगदेवे, महेवाना वु, वासुदेवे वासुदेवायु, साधुये साधुमोना ने આ કથનનું તાત્પર્ય ફક્ત આટલું જ છે, કે મહેતાએ જે સર્વોત્તમ તીથી પ્રવતન વગેરે કારી કર્યાં છે, તે કાર્યો ખીને કાઈ કરી શકે જ નહિ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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