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________________ ४२५ अनुयोगद्वारसूत्र तदित्यर्थः । यद्वा-अनाति-भुङ्क्ते पालयति वा अर्थान् यः सोऽक्षो जीवः । अक्षं प्रतिगतं प्रत्यक्षम् । अर्थः पूर्वोक्त एव अक्षमक्षं पतिगतमिति प्रत्यक्षमिति कैश्चिद् विगृहीतं तत्र युक्तम् अव्ययीभावस्य नपुंसकत्वेन प्रत्यक्षो बोधः प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्ष ज्ञानम् इति लिङ्गत्रयस्यानुपपन्नत्वात् । तच्च प्रत्यक्षम् इन्द्रियप्रत्यक्षनोइन्द्रियपत्यक्षेति द्विविधम् । तत्र-इन्द्रियप्रत्यक्षम्-इन्द्रिय श्रोत्रादिकं तनिमित्त तत्सहकारिकारणं यस्य ज्ञानस्य तदलिङ्गिकं शब्दरूपरसगन्धस्पर्शविषयज्ञानम् । इदं च इन्द्रलक्षणजीवात् परम्-अतिरिक्तं निमित्तमाश्रित्योत्पद्यते । यथा धूममाश्रित्याग्निज्ञानम्, अत इदं ज्ञानमपि वस्तुतः परोक्षमेव, तथापीदं लोकव्यवहारतः होता है उसका नाम प्रत्यक्ष ज्ञान है। "आश्नाति-भुङ्क्ते पालयति वा अर्थान् यः सः अक्षो जीवः" इस व्युत्पत्ति का भी यही पूर्वोक्त अर्थ है जो " अक्ष अक्ष प्रति गतं प्रत्यक्षम्-ऐसी व्युत्पत्ति इस प्रत्यक्ष शब्द की करते हैं वह युक्त नहीं है। क्योंकि ऐसी व्युत्पत्ति करने में अव्ययीभाव समास होता है और वह सदा नपुंसकलिङ्ग में होता है तब "प्रत्यक्षो बोधः प्रत्यक्षा बुद्धिः, प्रत्यक्ष ज्ञानम्" इस प्रकार से त्रि. लिंगता प्रत्यक्षशब्द में नहीं आ सकेगी। अतः पूर्वोक्त व्युत्पत्ति ही प्रत्यक्ष शब्द की निर्दोष है । जिस प्रत्यक्षज्ञान की उत्पत्ति में इन्द्रियाँ सहकारि कारण पडती है, वह इन्द्रियप्रत्यक्ष है । वैसे देखा जावे तो सिद्धान्त के अनुसार ऐसा ज्ञान परोक्ष ही माना गया है। क्योंकि इन्द्रियों की सहायता से उत्पन्न ज्ञान सब ही आत्मातिरिक्त पर की सहायता से उत्पन्न होने के कारण धूम की सहायता से उत्पन्न अग्नि तेनु नाम प्रत्यक्ष ज्ञान छे. 'अश्नाति-भुङ्क्ते पालयति वा अर्थान् यः सः अक्षो जीवः' व्युत्पत्ति ५५ मे पूरित मय छे. २ 'अक्ष अक्ष प्रति गत-प्रत्यक्षम् ' मानी युत्पत्ति मा प्रत्यक्ष शहनी ४२ छ, तयुत નથી. કેમકે આ જાતની વ્યુત્પત્તિ કરવામાં અવ્યયીભાવ સમાસ થાય છે. અને a'मेशा नधु म थाय छे.. त्यारे 'प्रत्यक्षो बोधः प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्षं ज्ञानम् ' मा शत nित प्रत्यक्ष शाहमा आवी शरी नही. तथा પ્રત્યક્ષ શખની પૂર્વોકત વ્યુત્પત્તિ જ નિર્દોષ કહેવાય. જે પ્રત્યક્ષ જ્ઞાનની ઉત્પત્તિમાં ઇન્દ્રિય સહકારિ કારણ તરીકે હોય તે ઈન્દ્રિય પ્રત્યક્ષ છે. આમ ખાપણે વિચાર કરીએ તે સિદ્ધાન્ત મુજબ એવું જ્ઞાન પરોક્ષ જ માનવામાં આવ્યું છે. કેમ કે ઈન્દ્રિયોની સહાયતાથી ઉત્પન્નજ્ઞાન સર્વ આત્માતિરિત પર' ની સહાયતાથી ઉત્પન્ન થવા બદલ ધૂમની સહાયતાથી ઉત્પન્ન અગ્નિજ્ઞાનની
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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